Sunday, February 25, 2018

पहलू में धड़कता मेरा दिल.....विकास शर्मा "दक्ष"

हर सांस के साथ पहलू में धड़कता मेरा दिल,
धड़कन में तुम एहसास कराती कि मैं हूँ अभी।

तन्हाई से डर कर मेरा आँखें बंद कर लेना,
तसव्वुर में परछाई दिखाती कि मैं हूँ अभी।

ख़ुद में करना तफ़्सील से तलाश ख़ुद को,
अन्दर से वही आवाज़ आती कि मैं हूँ अभी।

घबरा के ख़ामोशी के आगोश में सोता जब,
इक थपकी प्यार से सुलाती कि मैं हूँ अभी।

भरोसा ख़ुद पे जब होने लगता है कुछ कम,
हलकी सी शाबाशी है जगाती कि मैं हूँ अभी।

ऐसे में कैसे कहूँ कि तुम मुझ में कहीं नहीं,
रूह पे मेरी है आयात छपी कि मैं हूँ अभी।

मेरी हमनवा तेरी जुदाई का कैसा रंज-ओ-ग़म,
जब अनकही हर सांस में बसी कि मैं हूँ अभी।

- विकास शर्मा "दक्ष"

Saturday, February 24, 2018

परिक्रमा....डॉ. भावना कुँअर

परिक्रमा!
तुम यहाँ
तुम यहाँ क्यों खड़ी हो
अभी तो तुम वहाँ थी
ये कैसे सम्भव है
कि तुम दोनों जगह मौजूद हो
क्योंकि तुम तो एक हो
अभी तो सुख से विलीन थी
अब यहाँ दु:ख से आसक्त हो
असम्भव है ये
तुम्हारा दोनों जगह होना
क्या?
सुख दु:ख का
पाठ पढ़ा रही हो!
या व्यर्थ ही
चक्कर लगा रही हो!
कभी तो तुम
दो दिलों को
एक करने के लिये
अग्नि के फेरे लगा रही हो
कभी विरह व्यथा में जलते हुए
पिता का पुत्र से वियोग दिला रही हो
-डॉ. भावना कुँअर

Friday, February 23, 2018

लक्ष्य को साधें (हाइकु)....कुसुम कोठारी

अम्बर सजा
इंद्रधनुषी रंग
बौराई दिशा। 

चांद सितारे
ले उजली सी यादें
आये आंगन। 

कौन छेडता
मन वीणा के तार
धीरे धीरे से।

दूधिया नभ
निहारिका शोभित
मन चंचल ।

हवा बासंती
बहती धीरे धीरे
गूंजे संगीत।

दरख्त मौन
बसेरा पंछियों का
सुबह तक।

सूरज जला
पहाड़ थे पिघले
नदी उथली ।

राह के कांटे
किसने कब बांटे
लक्ष्य को साधें।

-कुसुम कोठारी 

Thursday, February 22, 2018

भरोसा..क्षणिकाएँ......अनुराग अन्वेषी


जो कहते हैं
कि खुद के अलावा
किसी और पर नहीं कर सकते भरोसा
दरअसल, वह खुद की निगाह में
भरोसे के लायक नहीं होते।

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यह पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं
कि आशंकाएं जहां खत्म होती हैं
वहीं से शुरू होती है
भरोसे की दुनिया

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जो मानते हैं
कि दूसरों पर भरोसा जताना
खुद पर से भरोसे का उठ जाना होता है
या फिर अपने भरोसे की मजबूती को और बढ़ाने का
एक शातिराना चाल होता है
ठीक से टटोलें उनकी जिंदगी
वहां उपलब्धि कम, ज्यादा मलाल होता है
-अनुराग अन्वेषी
ए-802, जनसत्ता सोसाइटी, सेक्टर 9,
वसुंधरा, गाजियाबाद 201012 (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल : 9999572266

Wednesday, February 21, 2018

मैं भी मुस्कुरा उठी ....कुसुम कोठारी

ख्वाबों मे वो हंस रही थी 
मैं भी मुस्कुरा उठी 
ख्वाबों मे वो गुदगुदा रही थी
मै भी खिल खिला उठी 
ख्वाबों में वो हिम्मत दे रही थी 
मैं पंख फैला के उड़ी
ख्वाबों मे वो गा रही थी
मैं भी गुनगुन उठी 
ख्वाबों मे वो ठुमक रही थी 
मैं भी थिरक उठी
ख्वाबों मे वो अलसा रही थी 
मैं भी मीठी नींद छोड़ उठी
ख्वाबों मे दूर खड़ी वो कौन थी 
वो जिंदगी थी वो मेरी जिंदगी ।। 
-कुसुम कोठारी

Tuesday, February 20, 2018

प्रश्न....शबनम शर्मा


मत करो मुझसे कोई
भी प्रश्न
मैं प्रश्नों से घिरी
ज़िन्दगी जीना नहीं चाहती।
छटपटाती है ज़िन्दगी
तो कोई भी पूछता नहीं
फिर क्यों टकटकी सी
लगाते हो, जब कभी
चेहरे पर मुस्कुराहट
आती है पल भर के लिए
छिपाये हैं मैंने आँसुओं के
सैलाब, कई काली भीषण रातों,
तरसते दिल में।

- शबनम शर्मा

Monday, February 19, 2018

पानी की बूँदें कहें....मनोज कुमार शुक्ल ‘मनोज’

पानी की बूँदें कहें, मुझको रखो सहेज।
व्यर्थ न बहने दो मुझे, प्रभु ने दिया दहेज॥

बादल बरखें नेह के, धरा प्रफुल्लित होय।
हरित चूनरी ओढ़ के, प्रकृति मुदित मन होय॥ 

ताल तलैया बावली, बनवाने का काम।
पुण्य कार्य करते रहे, पुरखे अपने नाम॥

निर्मल जल पीते रहे, दुनिया के सब लोग।
नहीं किसी को तब हुआ, इससे कोई रोग॥

अविवेकी मानव हुआ, कर बस्ती आबाद।
नदी सरोवर बावली, किए सभी बरबाद॥

जल को संचित कीजिये, ताल बांध औ कूप। 
साफ स्वच्छ इनको रखें, नहीं छलेगी धूप॥

सरवर गंदे हो गये, तो जीवन दुश्वार । 
जल, थल, नभ-चर औ अचर, संकट बढ़ें हज़ार॥

जल जीवन मुस्कान है, समझो इसका अर्थ ।
पानी बिन सब सून है, नहीं बहाओ व्यर्थ॥
-मनोज कुमार शुक्ल ‘मनोज’

Sunday, February 18, 2018

इश्क़.....निर्मल सिद्धू

इश्क़ का शौक़ जिनको होता है
मौत का न ख़ौफ़ उनको होता है

घूमते फिरते हैं फ़क़त दर बदर
ये मर्ज़ न हर किसी को होता है

ली होती है मंज़ूरी तड़पने की
मिला ख़ुदा से यही उनको होता है

चुनता है वो भी ख़ास बन्दों को ही
इसलिये न जिसको तिसको होता है

सहरा की रेत हो या फ़ाँसी का फंदा
गिला कुछ भी न उनको होता है

अख़्तियार में कुछ रह नहीं जाता
ये इशारा जब दिल को होता है

ख़्याल निर्मल को ये सता रहा है
ख़ुदाया, क्यों नहीं सबको होता है
-निर्मल सिद्धू

Friday, February 16, 2018

आवाज़.... दीप्ति शर्मा

आवाज़ जो
धरती से आकाश तक
सुनी नहीं जाती
वो अंतहीन मौन आवाज़
हवा के साथ पत्तियों
की सरसराहट में
बस महसूस होती है
पर्वतों को लाँघकर
सीमाएँ पार कर जाती हैं
उस पर चर्चायें की जाती हैं
पर रात के सन्नाटे में
वो आवाज़ सुनी नहीं जाती
दबा दी जाती है
सुबह होने पर
घायल परिंदे की
अंतिम साँस की तरह
अंततः दफ़न हो जाती है
वो अंतहीन मौन आवाज़

-दीप्ति शर्मा

Thursday, February 15, 2018

पागल है दिल

पागल है दिल संग यादों के निकल पड़ता है,
चाँद का चेहरा देख लूँ नीदों में खलल पड़ता है।

बिखरी रहती थी खुशबुएँ कभी हसीन रास्तों पर,
उन वीरान राह में खंडहर सा कोई महल पड़ता है।

तेरे दूर होने से उदास हो जाती है धड़कन बहुत,
नाम तेरा सुनते ही दिल सीने में उछल पड़ता है।

तारों को मुट्ठियों में भरकर बैठ जाते है मुंडेरों पे,
चाँदनी की झील में तेरे नज़रों का कँवल पड़ता है।

याद तेरी जब तन्हाई में आगोश से लिपटती है,
तड़पकर दर्द दिल का आँखों से उबल पड़ता है।

            #श्वेता🍁

उसका हंसना याद आ रहा है...केशव शरण

न संगीत, न फूल
उसका हंसना
याद आ रहा है
संगीत का बिखरना
और फूलों का झरना
याद आ रहा है
याद आ रहा है
मेरा मर मिटना
उसकी उस दिलकश हंसी पर
और इसी के साथ
आ रहा है रोना
उसका दुखी, बीमार
उदास होना
क्या बताऊं
अखर रहा है
किस क़दर
कुछ इस क़दर
कि न संगीत अच्छा लग रहा है
न फूल अच्छे लग रहे
-केशव शरण

Wednesday, February 14, 2018

बेमौसम हिमपात....अखिल भंडारी

दरख़्तों पर नये पत्ते
हरे होने लगे हैं लॉन 
चटखती महकती कलियाँ 
चमकती धूप, हल्की हल्की तपिश 
धीमे धीमे से बहती सर्द हवा 
खुला खुला सा नीला आकाश 
वापसी मौसमी परिंदों की 
गर्म कपड़ों में सैर करते बुज़ुर्ग
सब तरफ़ फूल खिलने वाले हैं 
मगर, अचानक, बरफ़ की चादर 
स्याह बादल, सूनी गलियाँ 
सारा मंज़र बदल गया है
-अखिल भंडारी

Tuesday, February 13, 2018

ख़ुशबू



साँसों से नहीं जाती है जज़्बात की ख़ुशबू
यादों में घुल गयी है मुलाकात की ख़ुशबू



चुपके से पलकें चूम गयी ख़्वाब चाँदनी
तन-मन में बस गयी है कल रात की ख़ुशबू



नाराज़ हुआ सूरज जलने लगी धरा भी

बादल छुपाये बैठा है बरसात की ख़ुशबू



कल शाम छू गये थे तुम आँखों से मुझे

होंठों में रच गयी तेरे सौगात की ख़ुशबू



तन्हाई के आँगन में पहन के झाँझरे

जेहन में गुनगुनाएँ तेरी बात की ख़ुशबू



        #श्वेता🍁

Monday, February 12, 2018

आँखें नही दिल भी है नम....रुचि शाही

हजारों आँसू सैकड़ों गम
आँखें नही दिल भी है नम

आकर भर लो ना बाँहों मे
तुम बिन तनहा रह गए हम

वो क्या जाने इश्क का मतलब
रोज बदलते हैं जो हमदम

राख से हो सारे गए अरमाँ
दिल ये जला है मद्धम-मद्धम

दर्द हुआ है कम सा अब तो
बरसी है आँखे यूँ भरदम

– रूचि शाही

Sunday, February 11, 2018

न दैन्यं न पलायनम्।’’ ......................अटल बिहारी वाजपेयी


कर्तव्य के पुनीत पथ को
हमने स्वेद से सींचा है,
कभी-कभी अपने अश्रु और—
प्राणों का अर्ध्य भी दिया है।

किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में—
हम कभी रुके नहीं हैं।
किसी चुनौती के सम्मुख
कभी झुके नहीं हैं।

आज,
जब कि राष्ट्र-जीवन की
समस्त निधियाँ,
दाँव पर लगी हैं,
और,
एक घनीभूत अंधेरा—
हमारे जीवन के
सारे आलोक को
निगल लेना चाहता है;

हमें ध्येय के लिए
जीने, जूझने और
आवश्यकता पड़ने पर—
मरने के संकल्प को दोहराना है।

आग्नेय परीक्षा की
इस घड़ी में—
आइए, अर्जुन की तरह
उद्घोष करें :
‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’’ 

-अटल बिहारी वाजपेयी

Saturday, February 10, 2018

हारा हूँ तो क्या हारा......अभिषेक नायक

हारा हूँ तो क्या हारा,
जीवन भी तो मृत्यु के आगे 
एक दिन हारता ही है! 
इस हार में भी अगर मैं विचलित नहीं,
तो संसार मैंने जीता है!

गिर कर कोई कितना गिर सकता है ,
सिर्फ़ और सिर्फ़ इस धरातल पर,
जो कि सबका आधार है!

स्वयं को पुनः आत्मनियंत्रित कर,
कर आत्मकेन्द्रित!
पहुंच अब उस सीमा पर,
जहाँ तुझ से पहले और तुझ से आगे 
कोई न हो...
न हो कोई, अन्तर्द्वन्द!!  

-अभिषेक नायक

Friday, February 9, 2018

पलाश (हाइकु).......ज्योत्सना प्रदीप


1.
पलाश-वन 
पद्मिनी का मानो 
जौहर-यज्ञ।
2.
तुम्हारी होली!
शहीद हुए देखो 
पलाश-पुष्प।
3.
पलाश-वन
बन गई देह ये
तुम्हारे बिन।
4.
जाने कब से
और किससे जले
पलाश–प्रेमी।
5.
लाल -पीले हैं
जन्म से ही क्रोधित
पलाश–पुष्प।
6.
पलाश-पुष्प
मानो नव-वधुएँ
सभा में साथ।

-ज्योत्सना प्रदीप

Thursday, February 8, 2018

फगुनायौ अम्बर आकाश......डॉ. इन्दिरा गुप्ता

फागुन छायो अब बसंत पर 
फगुनायौ अम्बर आकाश 
अबीर गुलाल भर घट के भीतर 
दियो उंडेल उषा नभ आज ! 

चटख केसरी रंग घुल गयो 
थोड़ो टेसू दिनो डार 
नव लाजवंती नार सरीखो 
अम्बर सजो धजो सो जाय ! 

नीलाम्बुज ने ओढ़ी चुनर 
हरीत पात की बूटी छाय
जल लागे ज्यू धूलि चुनरिया 
सागर जल रंग दिनो जाय ! 

फागुन आयो बजे दुंदभी 
मनइ चंग फगुनाई जाय 
चहुँदिश बाज रहे नक्कारे 
ऋतु गुलाल की हिय भरमाय! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

Wednesday, February 7, 2018

नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है.....अवधेश कुमार मिश्र "रजत"

नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है,
टकराकर वो चट्टानों से फिर थोड़ा सम्भलती है।
किसी नवजात बच्चे ने लिया हो जन्म जैसे कि,
हर्षित हो बड़े ही वेग से फिर वो नीचे उतरती है॥

बनाती राह ख़ुद अपनी सँवारे ज़िन्दगी सबकी,
पाले गोद में सबको करे ना बात वो मजहब की।
करे शीतल मरुस्थल को वनों को भी दे जीवन,
सींचकर फसलों को वो खेतों को दे नव यौवन।

करे निःस्वार्थ वो सेवा न थकती है न रुकती है॥
नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है॥

हुए हम स्वार्थ में अंधे मिटाते रोज उपवन को,
करें दूषित उसे ही जो करे स्वच्छ तन–मन को।
बहाते मूर्तियाँ देवों की जब हम धारा में इसकी,
कभी सुनकर देखो लेती हैं प्रतिमायें वो सिसकी।

तुम्हें क्या भान है तब आस्था कैसे बिलखती है॥
नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है॥

कूड़ों से, शवों से पाटते हैं हर दिन हम इसको,
ब्यथा अपनी सुनाये नदी जाकर अब किसको।
बाँधा हर कदम पर वेग को इसके अब हमने,
कहाँ देते हैं स्वच्छन्द हो इसको तो अब बहने।

बन्धन मुक्त होने के लिए यह हरपल तड़पती है॥
नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है॥

सहन की दीवारें जब भी इसकी ध्वस्त होती हैं,
मनुष्यों की हर इक शक्तियाँ तब पस्त होती हैं।
सीमायें तोड़कर ये जब विनाशक रूप में आये,
इसके कोप के आगे न फिर तो कोई ठहर पाये।

प्रलय के बाद खुद भी "रजत" ये तो सिसकती है॥
नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है॥
-अवधेश कुमार मिश्र "रजत"

Tuesday, February 6, 2018

बात दिल की अब समझता है कौन.....आरती आलोक वर्मा



आंखों का दरिया छुपाने के लिये
मुस्कुराते  हैं      जमाने  के लिये ।।

बात दिल की अब समझता है कौन
जायें किसको गम दिखाने के लिये ।।

हां, हमे मजबूत होना ही पड़ा
राह से पत्थर  हटाने के लिये  ।।

सर झुकाना मंजूर कर "आरती "
फ़ासले दिल के मिटाने के लिये ।।

Monday, February 5, 2018

ये कैसा बचपन.....डॉ. आरती स्मित


मैली कुचैली बोरी 
ठूँस-ठूँस कर 
भरे जानेवाले कचरे ---
जूठन और भी बहुत कुछ !
उन्हें बटोरते नन्हे हाथ 
बचपन के।
खेल नहीं खिलौने नहीं
कूड़े को उलीचती उँगलियाँ 
गंदगी से खुजलाता बदन 
फेंके जूठे केक और बिस्कुट 
छीनने को आतुर श्वान
क्रंदन करता अन्तर्मन!
ये कैसा बचपन?

आँखें है ख़्वाब नहीं 
क़दम हैं गति नहीं 
साँसें हैं जीवन नहीं 
ना हँसी-ठिठोली ना अल्हड़पन!
ये कैसा बचपन?

ललचाई नज़रें 
टुक-टुक देखती किताबें /
जूते और पोशाकें 
सुनतीं प्रार्थना की ध्वनि 
और हमउम्रों का शोर 
चेहरा धँस जाता बरबस 
लोहे के सींखचों में;
कुछ थाह पा लेने की ललक 
दरबान की कठोर आवाज़ 
रपेटने को खूंखार कुत्ते 
झुरझुरी खा जाता तनमन!
ये कैसा बचपन?

कूड़े की गठरी में 
कूड़े–सी ज़िंदगी !
माँ–बाप की गोद नहीं 
फुटपाथ का जीवन 
मंदिर में मुस्काते भगवान
आकुल मन है अनबूझ प्रश्न!
ये कैसा बचपन?

-डॉ. आरती स्मित