Monday, August 19, 2019

88.."किराना दुकानों में अब शराब मिलेगी"

स्नेहिल नमस्कार
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"किराना दुकानों में अब शराब मिलेगी"
झारखंड सरकार का प्रस्ताव।

मेरे विचार- 
 अब शराबियों के लिए लाइसेंसी दुकान का झंझट खत्म साथ ही पीने वालों को घर का माहौल मिलेगा।
 मोहल्ले में नये किराना दुकान खोलने के लिए व्यापारियों का
 उत्साह देखते ही बन रहा है।
  शराब की आसान उपलब्धता देखते हुये
महिलाओं और बच्चों में भी काफी उत्सुकता है।
कोलड्रिंक व्यापारी अब शराब बेचने का मन बना रहे।
अगले सत्र के बजट पेश होने तक राजस्व में तिगुना लाभ संभव है और शराबियों की संख्या में....?
अब असमंजस तो ई है कि लोग खाये कि पीये?

★★★★★★

आइये आज शाम की रचनाएँ पढ़ते हैं-
रचनाओं के साथ कोई तस्वीर नहीं थी इसलिए
तस्वीरें मेरी ली हुई मैंने लगा दी है।
आज विश्व फोटोग्राफी दिवस है न।


आ.दिगंबर नासवा जी

जाने क्यों आँखें रहती नम-नम.
सबके अपने अपने गम
कुछ के ज्यादा कुछ के कम
सह लेता है जिसमें दम
सुन आँसूं पलकों के पीछे थम 
जाने क्यों आँखें ... 
★★★★★
आ. रवींद्र सिंह यादव जी

नशेमन
ख़ामोशियों में डूबी 
चिड़िया उदास नहीं, 
दरिया-ए-ग़म का 
किनारा भी पास नहीं। 

दिल में ख़लिश 
ता-उम्र सब्र का साथ लिये, 
गुज़रना है ख़ामोशी से 
हाथ में हाथ लिये।  


★★★★★
आ.अपर्णा जी

कविता की रेसिपी


तुम्हारे शब्दों की छांव में,
छुप जाएगा सारा जहां,
अपने -अपने ज़ख़्म छिपाये हुए लोग
मरहम की आस में आएंगे निकट,
तुम्हारी कविता में खोज लेंगे 
अपने-अपने प्रेम,
अपनी आदतें, अपने रोष!
कविता तब कविता नहीं होगी,
होगी मानव मन का आख्यान,

न कम न ज़्यादा

★★★★★
आ.अनिता जी
हरसिंगार के फूल झरे
तस्वीर:अनीता जी के ब्लॉग से
--
प्रथम किरण ने छूआ भर था
शरमा गएझर– झर बरसते
सिउली के ये कुसुम निराले !

कोमल पुष्प बड़े शर्मीले
नयन खोलते अंधकार में
उगा दिवाकर घर छोड़ चले !

छोटी सी केसरिया डाँडी
पांच पंखुरी श्वेत वर्णीय
खिल तारों के सँग होड़ करें !

★★★★★
आ.कौश्लेन्द्रम् जी
मैं प्रायः दो बातें कहा करता हूँ – एक तो यह कि जब कभी विकसित सभ्यताओं का पतन प्रारम्भ होगा तब नयी सभ्यता का उदय एक बार फिर पहाड़ों और जंगलों में रहने वाली जनजातियों से ही होगाऔर दूसरी बात यह कि प्राणियों के मामले में सनातनधर्म की शुरुआत मॉलीकुलर बायोलॉज़ी से होती है । इन बातों को गहरायी से समझने की आवश्यकता है । वास्तव में सनातन धर्म को जैसा मैं समझ सका हूँ... उसकी व्यापकता क्वाण्टम फ़िज़िक्स में भी है और ह्यूमन फ़िज़ियोलॉज़ी में भी ।

★★★★★
प्रस्तुति कैसी लगी आपको?
आपकी प्रतिक्रिया बहुमूल्य है।

#श्वेता सिन्हा

Sunday, August 18, 2019

87..नशे से निकले तो सही कोई, तब जाकर तो कोई कहीं, एक सच लिखेगा

सादर अभिवादन..
कल भी हम थे
आज भी हम ही हैं
चिन्ताओँ को तलाक दें
कोई सजा नहीं मिलेगी
शर्तिया कह रहे हैं हम

आज की सद्य प्रकाशित रचनाओं पर एक नज़र..

तुम मांस-हीन, तुम रक्तहीन,
हे अस्थि-शेष! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल,
हे चिर पुराण, हे चिर नवीन!
तुम पूर्ण इकाई जीवन की,

यूँ न उभरी होंगी लकीरें, इस जमी पर! 
बंध गई होगी, पांव में जंजीर कोई, 
चुभ गए होंगे, शब्द बन कर तीर कोई, 
या उठ गई होगी, दबी सी पीड़ कोई, 
खुद ही, कब बनी है लकीर कोई, 
या भर गया है, विष ही फिज़ाओं में कोई

प्रतीक्षारत रहती है
जीवित आँखें
मन सकूँ पाए
मन प्रतीक्षारत रहता है
क्षुधा तृप्त रहे
क्षुधा से सिंधु पनाह मांगे।
तथाकथित अपनों के भरोसे
शव प्रतीक्षारत रहे..

गर कथन यह सत्य है तो,
बोझ फिर क्यों ढो रही हो?
या मुकद्दर पर तरस खा
थक गयी हो, सो रही हो?
हारता, हालात से
अब क्या कहूँ ऐ ज़िंदगी मैं?

रस्मोरिवाज  के नाज़ुक बँधन से,
बँधे  हैं  हमारे  हर बँधन,
मातृत्व को  धारणकर ,
ममता को निखारा है हमने , 
धरा-सा कलेजा ,
सृष्टि-सा रुप निखारा है हमने,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम |

आज अतिक्रमण कर बैठी
पर चलते-चलते एक खबर
सच में 
किसी दिन 
एक सच 

कोई 
कहीं 
तो 
लिखेगा 

झूठ 
लिखने 
का 
नशा 

बहुत 
जियादा 
कमीना है 
.......
अब सच में बस
सादर
यशोदा

Saturday, August 17, 2019

86...तुम सूरज की जगह चाँद देखते हो

सादर अभिवादन..
73 वीं आजादी के बाद का दूसरा दिन
शान्ति तो है..काश बनी रहे
ज्यादा कुछ न लिखते हुए...
चलें आज की मिली-जुली रचनाएँ देखें...

तुम सूरज की जगह चाँद देखते हो?
तुम देशद्रोही हो!

तुम गाय को नहीं, बच्चे को बचाते हो?
तुम देशद्रोही हो!

तुम राम नहीं, ईश्वर कहते हो?
तुम देशद्रोही हो!

तुम जय भारत नहीं, जय हिंद कहते हो?
तुम देशद्रोही हो!

स्वतंत्रता दिवस की परेड में खड़े
इस महादेश के बच्चे
आपस में बातें कर रहें हैं
कि जहां
मजदूर,किसान,खेत और रोटी की 
बात होनी चाहिए
वहां हथियारों की बात हो रही है


होता रहा वार्तालाप मूक
अजनबी थे दोनो ही,
मुक्ति की समाधि में उतरते हुए
दोनो की मुट्ठियाँ गुंथी थी..


सारे मनोरम रंगों को 
यूँ ही उलीच दिया है या 
अपनी विलक्षण तूलिका से 
तूने आसमान के कैनवस पर  
यह अनुपम नयनाभिराम
चित्र बड़ी दक्षता के साथ
धीरे-धीरे उकेरा है !


अवनि से अंबर तक दे सुनाई
मौसम का  रुनझुन  संगीत ,
दिवाकर के उदित होने का
दसों दिशाएं गाये मधुर गीत।
आज बस
शायद कल फिर मिलें..
सादर


Friday, August 16, 2019

85 --लिखना जरूरी है तरन्नुम में मगर ठगे जाने का सारा बही खाता हिसाब

स्नेहाभिवादन !
आज की सांध्यकालीन प्रस्तुति में
आप का स्वागत है --
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देखिए 
इस नन्हें बालक की मुस्कुराहट को
नज़र आएगी एकप्यारी सी मुस्काती कविता….
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समाई हुई हैं इसी जिन्दगी में…

यशोदा अग्रवाल

देखिए इस नन्हें बालक
की मुस्कुराहट को
नज़र आएगी एक
प्यारी सी
मुस्काती कविता....
दिखने वाली
सभी कविताएँ
जिनमें..
हर्ष है और
विषाद भी है

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लिखना जरूरी है

 सारा बही खाता हिसाब

लिखना 
जरूरी है 

तरन्नुम 
में मगर 

ठगे 
जाने का 
सारा 

बही 
खाता हिसाब
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फाइनली हम पणजी में थे.
 खिड़की का पर्दा हटाया तो सामने समन्दर 
मुस्कुराता मिला.जैसे वो मेरे सब्र का इम्तिहान ले रहा हो. 
शाम करीब थी और समन्दर सामने. मैं लहरों का 
उछाल देख पा रही थी,
 आवाज सुन पा रही थी बस हाथ बढ़ाने की देरी थी...
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 पतंग

Kite, Fly, Wind, Fun, Kite, Kite, Kite 

दुकानों में सजी पतंगें 
बहुत ललचाती हैं,
पर उनसे ज़्यादा ललचाती हैं 
वे पतंगें,जो कट जाती हैं.

ऐसी पतंगों के पीछे 
लोग पागल हो जाते हैं,
उन्हें पाने के लिए 
दौड़ते हैं, झगड़ते हैं.
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 ... डॉ. वर्षा सिंह 

आज़ादी के गीत हमेशा गाएंगे । 
अपना प्यारा परचम हम लहराएंगे 

संघर्षों के बाद मिली जो आज़ादी , 
उसका हम इतिहास सदा दोहरायेंगे ।
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शुभ संध्या अनीता सैनी

Thursday, August 15, 2019

84.... है बैठा सुबह से मेरी छत पे कागा....

स्नेहाभिवादन !
स्वागत आज की सांध्य दैनिक प्रस्तुति में..
स्वतंत्रता दिवस एवं रक्षाबंधन के पावन अवसर
पर सभी को हार्दिक बधाईयाँ एवं शुभकामनाएँ
एक और विशेष बात.. हमारी चर्चाकारा

आदरणीया अनीता जी सैनी का जन्मदिन भी है उन्हें मुखरित मौन परिवार की ओर से अशेष शुभकामनाएँ

शहीदों को याद करें ,
मान से शीश झुकायें ।।
फहरायें तिरंगा शान से ,
गर्व से जन गण मन गायें ।।
आओ सब मिल कर आज ,
स्वन्तत्रता दिवस मनायें ।
    
  "मीना भारद्वाज'

★★★★★

आपके लिए आज के चयनित सूत्र...

तीन रंग की ओढ़ के चूनर
लहराती ममता का आँचल
गंगा-यमुना इसकी बेटियाँ
बेटा इसका हिंद महासागर
हिमालय पहरेदार बना खड़ा
कश्मीर सिर का ताज बना
एकता-अखंडता इसका श्रृंगार
सभ्यता-संस्कृति गले का हार

★★★★★

रक्षक  हैं जो देश के
सीमा पर देते पहरा 
मर मिटते वो देश पर 
जान की बाजी लगा कर
शूरवीर हो जिसके बेटे 
उस देश का क्या कहना 
दुनिया में है सबसे प्यारा 
राखी का यह बंधन 

★★★★★

आदिवासी असंतोष के प्रतीक रहे ओडिशा के ‘पाइक विद्रोह‘ को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का दर्जा दिए जाने की पहल हो चुकी है। 1857 के सैनिक विद्रोह से ठीक 40 साल पहले 1817 में अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय नागरिकों ने जबरदस्त सशस्त्र विद्रोह किया था। इसके नायक बख्शी जगबंधु थे। इस संघर्ष को आजादी की पहली लड़ाई की श्रेणी में रखने की मांग ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने उठाई थी। जिसे स्वीकार किया गया। 2018 से एनसीआरटी की इतिहास संबंधी पाठ्य पुस्तक में पाइक विद्रोह का पाठ जोड़ दिया गया है। 

★★★★★

उन शहीदों को कैसे भूलें
जो झूला फांसी का झूले

वो हंसते रहे सर कटते रहे
दुश्मन के छक्के छुडाते रहे

न रूके कभी न झुके कभी
मां भारती के लिए मिटते रहे

★★★★★

चूड़ी न कंगन
न सिक्कों की खन खन
न गोटे की साड़ी
न पायल की छन छन !

न गहना न गुरिया
न चूनर न लहँगा   
न देना मुझे कोई
उपहार महँगा !

★★★★★

इजाजत दें.शुभ संध्या
🙏
"मीना भारद्वाज"

Wednesday, August 14, 2019

83..ना बाँटी हैं जलेबियां और ना ख़ुद ही है खाई

सादर अभिवादन
भारतीय स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या
 पर
आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन
ऐसा लगता है अब शान्ति ही रहेगी
और ऐसा भी हो सकता है कि
ये तूफ़ान से पूर्व की शान्ति तो नहीं
शक हमे भारतवासियों पर नहीं
पर मीरज़ाफ़रों का क्या भरोसा

चलिए चले साथ लेकर सद्भाभावनाओं की टोकरी...

शतदल की
गंध उठे
मीठी डल झील से,
पदमा सचदेव
लिखें
कविता तफ़सील से,
बंजारे
घाटी के
बाँसुरी बजाना ।


अभिव्यक्ति की आज़ादी
के नाम पर 
अमर्यादित बेतुकी बातों को 
जाएज़ बताते हो
किसी का सम्मान 
पल में रौंदकर 
सीना फुलाते हो
तुम आज़ाद हो,
तो क्या आज़ादी बहुत बुरी होती है?
इंसान को इंसान की बेक़द्री और
अपमान करना सिखलाती है?



यूँ तो कर के ये सब
जतला रहे है सभी
देखो ना जरा ! ये देशभक्ति
जैसे करा के सत्यनारायण की कथा
या लगा कर संगम में
कुम्भ वाली डुबकी
दिखलाते हैं अक़्सर भक्ति
और सुना है ...
पा लेते हैं शायद पाप से भी मुक्ति


सपने में तुम्हारा शहर था। मैं पापा और कुछ परिवार के लोगों के साथ अचानक ही घूमने निकल गयी थी। तुम्हारा शहर मेरे सपने में थोड़ा क़रीब था, वहाँ बिना प्लान के जा सकते थे। तुम समंदर किनारे थे। तुमने चेहरे पर कोई तो फ़ेस पेंटिंग करा रखी थी...चमकीले नीले रंग की। या फिर कोई फ़ेस मास्क जैसा कुछ था। तुम्हारी बीवी भी थी साथ में। हम वहाँ तुमसे मिले या नहीं, वो याद नहीं है। 


अखंड सम्रद्ध भारत की छवि
सोने  की  चिड़िया  की तस्वीर   
जाने कब से मन में पनप रही थी
बचपन ने आँखें खोली थीं
परतंत्र देश में
तभी से यह था  अरमान
कोई बलिदान व्यर्थ ना जाएं 

आज बस
कल स्वतंत्रता दिवस है..
काश..हमें भी एक दिन का 
अवकाश मिलता
पर..नहीं..
सादर