Saturday, October 30, 2021

802...ऐसे डाला जाता है चारा ..

ऐसे डाला जाता है चारा ..

बेटा, इस मंगलवार को छुट्टी लेकर
घर आ जाना, कुछ ज़रूरी काम है

अमित बोला मम्मी, ऑफ़िस में बहुत काम है,
बॉस छुट्टी नहीं देगा
राधिका बोली अरे बेटा
वो एक रिश्ता आया था तुम्हारे लिये,
बड़ी ही सुंदर लड़की है,

अमित अरे माँ, बस इतनी सी बात,
तुम कहो और मैं ना आऊँ,
ऐसा हो सकता है भला..???
मन में फूट रहे लड्डूओं की आवाज
छिपाते हुए बेटे जी ने जवाब दिया
सोच रही थी कि एक बार तुम दोनों मिल लेते तो...

बॉस को किसी तरह टोपी पहनाकर,
रात को बेटा घर पहुँचा
माँ ने बेटे से ज़्यादा बात नहीं की,
बस खाना  परोसा और दूसरे दिन
जल्दी उठ जाने को कहा
सुबह के चार बजे तक तो नींद
बेटे की आँखों  से कोसों दूर थी,

माँ ने चाय  देते हुए कहा,
बाथरूम में कपड़े  रखे हैं,
बदलकर आ जाओ
बाथरूम में पुरानी टी-शर्ट
और शॉर्ट्स देखकर
बेटे का दिमाग़ ठनका,
बाहर आकर बेटे ने पूछा पुराने कपड़े ??

माँ ने मनोरम मुस्कान बिखेरते हुए कहा
घर की सफाई का बोलती तो तू
काम का बहाना बनाकर टाल देता,...
बोल….टालता की नहीं…
चल अब जल्दी से ये लंबा वाला झाड़ू उठा

तेरा बाप भी बहाने बना कर
समाज की मीटिंग में गया है
वो भी लड़की की माँ से मिलने के नाम पर आ रहा है
तू तो अभी
दीवार के कोने साफ कर,
बहुत जाले हो गये हैं 
सादर..

Friday, October 29, 2021

801...आप क्यों भावुक हो गए

 

एक 22-23 साल का नौजवान। साधारण सी दिखने वाली शर्ट, पैरों मे सस्ती सी चप्पल, एक जूते के दुकान में घुसा।


"क्या दिखाऊ भैया?" दुकानदार ने पूछा।

"लेडिज के लिए अच्छी सी चप्पल दिखाना जो अंदर से नरम हो एकदम फूल जैसी। अच्छे कंपनी की दिखाना भैया।"

"कौन सी साइज में दिखाऊ भैया?"

मेरे पास माँ के पैर का नाप नहीं है उसके पैर का छाप लाया हू। उस पर से चप्पल दे सकते है क्या?"

दुकानदार को थोड़ा अजीब लगा। "इसके पहले ऐसे किसी को चप्पल दी नहीं किसी को। आप अपनी माँ को ही ले आइए ना। फिर बदली का झंझट नहीं रहेगा।"

"मेरी माँ गाँव मे रहती है। आज तक उसने कभी चप्पल पहनी नहीं। मेरी पढ़ाई पूरी करने के लिए उसने दिन रात मेहनत की। मेरी छोटी सी फीस भरने के लिए लोगों के घर बर्तन मांजे, खेतों मे काम किया। बस इतना ही कहती थी, बेटा पढ़, बड़ा आदमी बन। एक फैक्टरी मे नौकरी लगी है और आज पगार मिली है। उसमे से आज उसके लिए चप्पल लूँगा और अपने हाथ से पहनाऊंगा। देखूँगा उसके आँखों की खुशी। क्या कहेंगी सुनना है मुझे।" इतना कह के उसने वो कागज आगे बढ़ाया। दुकानदार ने देखा, एक मैला सा कागज जिसपे पैरों के निशान बने थे।

दुकानदार की आंखें भर आयी। उसने पैरों के निशानो को छुआ। खुद उठा और एक अच्छी चप्पल निकाल के लाया। ठीक ठाक अंदाजा लगा के उसने निशान के माप की चप्पल उसे दिखाई। लड़के ने चप्पल पसंद की और पैसे देकर जाने लगा।

"रुको बेटा, ये और एक जोड़ी चप्पल लेकर जाना। माँ से कहना, बेटे ने लायी चप्पल खराब हो गई तो दूसरे बेटे ने दिया जोड़ा पहन ले, पर फिर कभी नंगे पाँव मत घूमना।"

लड़के के चेहरे पर एक खुशी झलक रही थी।" ये कागज मेरे पास छोड़ के जा। तूने मेरे माँ की याद दिला दी आज मुझे।"दुकानदार ने लड़के से कागज लिया और अपने पैसों के ड्रावर मे रखा और उस कागज को नमस्कार किया।

दुकान के नौकर देखते रह गए। "उस कागज को गल्ले मे क्यों रखे सेठ?" एक ने पूछा। "अरे, ये सिर्फ पैरों के निशान नहीं, लक्ष्मी के पाँव का छाप है। जिस माँ ने अच्छे संस्कार दे कर अपने बच्चे को बड़ा किया, उसे जीतने की प्रेरणा दी, उसके पैर अपने भी दुकान मे बरकत ले आयेंगे, इसलिए तो उसको तिजोरी में रखा। "
सादर

Thursday, October 28, 2021

800 ..अपेक्षा से भरा हुआ चित्त निश्चित ही दुखी होगा



दुख का कारण
याद रखना, अपेक्षा से भरा हुआ चित्त निश्चित ही दुखी होगा।
मैंने सुना है कि एक आदमी बहुत उदास और दुखी बैठा है। उसकी एक बड़ी होटल है। बहुत चलती हुई होटल है। और एक मित्र उससे पूछता है कि तुम इतने दुखी और उदास क्यों दिखाई पड़ते हो कुछ दिनों से? कुछ धंधे में कठिनाई, अड़चन है? उसने कहा, बहुत अड़चन है। बहुत घाटे में धंधा चल रहा है। मित्र ने कहा, समझ में नहीं आता, क्योंकि इतने मेहमान आते—जाते दिखाई पड़ते हैं! और रोज शाम को जब मैं निकलता हूं तो तुम्हारे दरवाजे पर होटल के तख्ती लगी रहती है नो वेकेंसी को, कि अब और जगह नहीं है, तो धंधा तो बहुत जोर से चल रहा है! उस आदमी ने कहा, तुम्हें कुछ पता नहीं। आज से पंद्रह दिन पहले जब सांझ को हम नो वेकेंसी की तख्ती लटकाते थे, तो उसके बाद कम से कम पचास आदमी और द्वार खटखटाते थे। अब सिर्फ दस पंद्रह ही आते हैं। पचास आदमी लौटते थे पंद्रह दिन पहले; जगह नहीं मिलती थी। अब सिर्फ दस पंद्रह ही लौटते हैं। धंधा बड़ा घाटे में चल रहा है।

मैं एक घर में मेहमान था। गृहिणी ने मुझे कहा कि आप मेरे पति को समझाइए कि इनको हो क्या गया है। बस, निरंतर एक ही चिंता में लगे रहते हैं कि पांच लाख का नुकसान हो गया। पत्नी ने मुझे कहा कि मेरी समझ में नहीं आता कि नुकसान हुआ कैसे! नुकसान नहीं हुआ है। मैंने पति को पूछा। उन्होंने कहा, हुआ है नुकसान, दस लाख का लाभ होने की आशा थी, पांच का ही लाभ हुआ है। नुकसान निश्चित हुआ है। पांच लाख बिलकुल हाथ से गए।

अपेक्षा से भरा हुआ चित्त, लाभ हो तो भी हानि अनुभव करता है। साक्षीभाव से भरा हुआ चित्त, हानि हो तो भी लाभ अनुभव करता है। क्योंकि मैंने कुछ भी नहीं किया, और जितना भी मिल गया, वह भी परमकृपा है, वह भी अस्तित्व का अनुदान है।

-ओशो 

Wednesday, October 27, 2021

799 ...मेरी है हर साँस तुम्हारी। तुम पर ही मैं सब कुछ हारी

सादर अभिवादन
अक्टूबर जा जा जा
जा कर जल्दी से जनवरी को भेज
बच्चें तरस गए, स्कूल देखे
खाना बनाना सीख गए
अब वे सोचते कुछ और सीखें..
रचनाओं पर एक नज़र....



 तुम ढूँढ़ो दुनिया में ईश्वर।
मेरे तो तुम ही ईश्वर हो।

मेरी है हर साँस तुम्हारी।
तुम पर ही मैं सब कुछ हारी।


मुझे बीहड़ में बिठाकर
मेरे सपनें मलबें में तब्दील कर
तुम चाहते हो मेरी कलम से
रंगीन तितलियों की
उन्मुक्त उड़ान मैं लिखूं ?




शूल भरी राहों से तनिक ना घबराते,  
पग छालों में भी आह नहीं निकालते,

संकट में शोंणित और वेगवान रहता,
अपनी विजय पर कभी नहीं इतराते ।

अपने बचपन को याद करता हूँ,
जो अब सिर्फ यादों में बचा है थोड़ा-थोड़ा
और जो अब लौटकर फिर नहीं आनेवाला
पिता कभी-कभार बुदबुदाते हुए याद आते हैं,
साँप गुजर गया और हम लकीर पीटते रहे

बस
सादर


Tuesday, October 26, 2021

798 ..टूटता तिलिस्म कविता हमेशा कविता नहीं होती है

 सादर अभिवादन

आज पता नहीं क्यूं लिंक चुन ली गई मेरे द्वारा
शायद ईश्वर को पता हो
रचनाएँ देखें



विसंगति
कैसी अघोर
कविता कोमल तुम्हारी
किन्तु हृदय
कठोर !

कविता दीदी


आदमी काम से नहीं चिन्ता से जल्दी मरता है
गधा दूसरों की चिन्ता से अपनी जान गंवाता है

धन-सम्पदा चिन्ता और भय अपने साथ लाती है
धीरे-धीरे कई चीजें पकती तो कई सड़ जाती है


चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’


जान चाहेगा नहीं जान सा माना चाहे
चाहिए चाहने देना जो दीवाना चाहे

दिल का दरवाज़ा हमेशा मैं खुला रखता हूँ
कोई आ जाए अगर वाक़ई आना चाहे


चलते-चलते एक समीक्षा


"कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता/
कहीं ज़मीं नहीं मिलती..कहीं आसमां नहीं मिलता"



अवसाद . सन्नाटा .. अधजगी रातें
कान में बजती अनगिनत बेगैरत आवाज़ें
और टूटता तिलिस्म
कविता हमेशा कविता नहीं होती है
वह suicide note लिखने का अभ्यास भी हो सकती है
या ऱोज जीते - जी मरने का हलफ़नामा भी
..
बस
सादर

Sunday, October 24, 2021

797..मां की इक उंगली पकड़कर हंस रहा बचपन मेरा..देवमणि पांडेय


 फूल महके यूं फ़ज़ा में रुत सुहानी मिल गई
दिल में ठहरे एक दरिया को रवानी मिल गई

घर से निकला है पहनकर जिस्म ख़ुशबू का लिबास
लग रहा है गोया इसको रातरानी मिल गई

कुछ परिंदों ने बनाए आशियाने शाख़ पर
गाँव के बूढ़े शजर को फिर जवानी मिल गई

आ गए बादल ज़मीं पर सुनके मिट्टी की सदा
सूखती फ़सलों को पल में ज़िंदगानी मिल गई

जी ये चाहे उम्र भर मैं उसको पढ़ता ही रहूं
याद की खिड़की पे बैठी इक कहानी मिल गई

मां की इक उंगली पकड़कर हंस रहा बचपन मेरा
एक अलबम में वही फोटो पुरानी मिल गई

Thursday, October 21, 2021

796 जीवन का टॉनिक ..प्रस्तुति - शैलेन्द्र किशोर जारूहार



मैं अपने विवाह के बाद. अपनी पत्नी के साथ शहर में रह रहा था।

बहुत साल पहले पिताजी मेरे घर आए थे। मैं उनके साथ सोफे पर बैठा बर्फ जैसा ठंडा जूस पीते हुए अपने पिताजी से विवाह के बाद की व्यस्त जिंदगी, जिम्मेदारियों और उम्मीदों के बारे में अपने ख़यालात का इज़हार कर रहा था और वे अपने गिलास में पड़े बर्फ के टुकड़ों को स्ट्रा से इधर-उधर नचाते हुए बहुत गंभीर और शालीन खामोशी से मुझे सुनते जा रहे थे।
       
अचानक उन्होंने कहा- "अपने दोस्तों को कभी मत भूलना। तुम्हारे दोस्त उम्र के ढलने पर पर तुम्हारे लिए और भी महत्वपूर्ण और ज़रूरी हो जायेंगे। बेशक अपने बच्चों, बच्चों के बच्चों को भरपूर प्यार  देना मगर अपने पुराने, निस्वार्थ और सदा साथ निभानेवाले दोस्तों को हरगिज़ मत भुलाना। वक्त निकाल कर उनके साथ समय ज़रूर बिताना। उनके घर खाना खाने जाना और जब मौक़ा मिले उनको अपने घर खाने पर बुलाना।  
कुछ ना हो सके तो फोन पर ही जब-तब, हालचाल पूछ लिया करना।"      

मैं नए-नए विवाहित जीवन की खुमारी में था और पिताजी मुझे यारी-दोस्ती के फलसफे समझा रहे थे।

मैंने सोचा-  "क्या जूस में भी नशा होता है जो पिताजी बिन पिए बहकी-बहकी बातें करने लगे? आखिर मैं अब बड़ा हो चुका हूँ, मेरी पत्नी और मेरा होने वाला परिवार मेरे लिए जीवन का मकसद और सब कुछ है।

दोस्तों का क्या मैं अचार डालूँगा?"
लेकिन फ़िर भी मैंने आगे चलकर एक सीमा तक उनकी बात माननी जारी रखी।
मैं अपने गिने-चुने दोस्तों के संपर्क में लगातार रहा।

समय का पहिया घूमता रहा और मुझे अहसास होने लगा कि उस दिन पिता 'जूस के नशे' में नहीं थे बल्कि उम्र के खरे तजुर्बे  मुझे समझा रहे थे।  

उनको मालूम था कि उम्र के आख़िरी दौर तक ज़िन्दगी क्या और कैसे करवट बदलती है।    

हकीकत में ज़िन्दगी के बड़े-से-बड़े तूफानों में दोस्त कभी नाव बनकर, कभी पतवार बनकर तो कभी मल्लाह बनकर साथ निभाते हैं और कभी वे आपके साथ ही ज़िन्दगी की जंग में कूद पड़ते हैं। सच्चे दोस्तों का काम एक ही होता है- दोस्ती निभाना।

ज़िन्दगी के पचास साल बीत जाने के बाद मुझे पता चलने लगा कि घड़ी की सुइयाँ पूरा चक्कर लगाकर वहीं पहुँच गयीं हैं जहाँ से मैंने जिंदगी शुरू की थी।  

विवाह होने से पहले मेरे पास सिर्फ दोस्त थे।


विवाह के बाद बच्चे हुए।

बच्चे बड़े हो हुए। उनकी जिम्मेदारियां निभाते-निभाते मैं बूढ़ा हो चला।

बच्चों के विवाह हो गए और उनके अलग परिवार और घर बन गए।

बेटियाँ अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गयीं।
उसके बाद उनकी रुचियाँ, मित्र-मंडलियाँ और जिंदगी अलग पटरी पर चलने लगीं।

अपने घर में मैं और मेरी पत्नी ही रह गए।
वक्त बीतता रहा।
नौकरी का भी अंत आ गया।
साथी-सहयोगी और प्रतिद्वंद्वी मुझे बहुत जल्दी भूल गए।

जो मालिक कभी छुट्टी मांगने पर मेरी मौजूदगी को कम्पनी के लिए जीने-मरने का सवाल बताता था, वह मुझे यूं भूल गया जैसे मैं कभी वहाँ काम करता ही नहीं था।

एक चीज़ कभी नहीं बदली- मेरे मुठ्ठी-भर पुराने दोस्त।

मेरी दोस्ती न तो कभी बूढ़ी हुई न ही रिटायर।

आज भी जब मैं अपने दोस्तों के साथ होता हूँ, लगता है अभी तो मैं जवान हूँ और मुझे अभी बहुत साल और ज़िंदा रहना चाहिए।  

सच्चे दोस्त जिन्दगी की ज़रुरत हैं, कम ही सही कुछ दोस्तों का साथ हमेशा रखिये।        

वे कितने भी अटपटे, गैरजिम्मेदार, बेहूदे और कम अक्ल क्यों ना हों, ज़िन्दगी के खराब वक्त में उनसे बड़ा योद्धा और चिकित्सक मिलना नामुमकिन है।

अच्छा दोस्त दूर हो चाहे पास हो, आपके दिल में धड़कता है।

सच्चे दोस्त उम्र भर साथ रखिये और हर कीमत पर यारियां बचाइये।
(ये है तो व्हाट्सएप्प आलेख पर इसे आलेख करे रूप में ढाला है
श्री शैलेन्द्र किशोर जारूहार जी ने)