Saturday, January 23, 2021

609 ..खून के बदले आज़ादी देने का जिसका था नारा

सांध्य अंक में आप सभी का

स्नेहिल अभिवादन

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१२५वीं वर्षगांठ है भारत के लाल निडर,निर्भीक सुभाषचंद्र बोस की,
यदि तोरे डाक शुने केऊ आसे तबे
ऐकला चलो रे...वाले जोश की।
नमन करता देश कैसे भुला सकता है?
खून और आज़ादी के नारे 
कण-कण में गूँज रहे थे तब
आवश्यकता थी प्राण फूँकते रोष की।


अमर ,अटल वह ध्रुव तारा ! ...ज्योति-कलश
खून के बदले आज़ादी देने का जिसका था नारा
मातृभूमि का वीर सिपाही हर इक दिल का है प्यारा

'जय हिन्द' उद्घोष को सुनकर जिसके ,बैरी थर्राया      
भारत के अम्बर पर चमका अमर,अटल वह ध्रुव तारा !

कलात्मक फ्यूज़न

पारम्परिक चित्रों से

सुसज्जित काले-काले गोदने ,

या फिर .. दिख जाते हैं कभी-कभार

सारे के सारे जनसमुदाय ही

आपादमस्तक 

राम-राम गुदवाए हुए


धूप के नखरे


बजरे पे पनियों का नज़ारा हसीन था 

महफ़िल में उसके साथ में होकर भी हम न थे 


राजा हो ,कोई रंक या शायर ,अदीब हो 

जीवन में किसके साथ खुशी और ग़म न थे 


बदला मेरा स्वभाव जमाने को देखकर 

बचपन में दांव -पेंच  कभी पेचोखम  न थे 


काँच का संसार

प्राण जी उठते हैं सहसा एक लंबे -
शीत निद्रा से, गर्म सांसों से
लम्हा लम्हा पिघलती
सी है ज़िन्दगी,
बहुरंगी
मीनपंखों से तैरती हैं हसीं लफ़्ज़ों
की कश्तियाँ, कांच के
दीवारों से टकरा
कर लौट
आती


संदर्भ जीवन का 


कुछ तो होगा ऐसा,
जिसके लिए जी-जान लगा के
मेंहदी की तरह रचता गया ..
रचता गया संसार चक्रव्यूह जैसा,
किसके लिए  ?
अभिमन्यु के लिए  ??
छल और बल की क्षुद्र विभीषिका 
डिगा ना पाई जिसकी सत्यनिष्ठा ।

मौजूदा हालात पर

माथे  तिलक  लगा  विदा कर 
रण   में  प्रण  जाना   मुझको 
काट   शीश  बैरी  दुश्मन  का 
चरणों में  तेरे चढ़ाना  मुझको ।


टीकाकरण अभियान की प्रसन्नता, बेहाल किसानों की चिंता और मारे गए पक्षियों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए इस वर्ष और आने वाले तमाम वर्षों से आशा रखते हैं कि हम अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन करें, देशहित प्रधान रखें और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता के भाव जागृत कर, उनकी रक्षा हेतु अपने स्वर बुलंद करें.
.... बस कल फिर सादर




Friday, January 22, 2021

608 ..कलपते सागर के हृदय की व्यथा शायद कोई ना जाने!

सादर अभिवादन
आज आपका परिचय एक नए ब्लॉग से करा रही हूँ
उम्मीद है आप हौस़लाअफ़जाई करेंगे
आप कवितानुमा आलेख लिख रहे हैं
मैं उनकी एक रचना को
आलेखनुमा कविता बनाकर प्रस्तुत कर रही हूँ
आप श्री संदीप शर्मा, सम्पादक
मासिक पत्रिका प्रकृति-दर्शन के हैं
कुल मिलाकर प्रकृति भी एक कविता ही है
इसमें सुर भी है और ताल भी है

सुबह कभी खेत में 
फसल के बीच 
क्यारियों में देखता हूँ तो 
तुम्हारी बातों के सौंधेपन के साथ 
जिंदगी का हरापन भी 
नज़र आ ही जाता है...। 
सोचता हूँ 
मुस्कान और हरेपन में कोई रिश्ता है

देखे तु्म्हें ये चांद इजाज़त नहीं उसे
शिक़वे शिकायतों की बातें फ़िज़ूल हैं,
हर रंग मेरे महबूब का मुझे क़ुबूल है।

ख़ता कोई भी तुमसे  हो नहीं सकती,
दामन पर तेरे दाग़ ज़माने की भूल है।


रात का सौंदर्य ...
झांझर है झनकी
मन भी बहका
बागों में कैसा
सौरभ महका
चहुं दिशा पसरे
उर्मि भरे घट।।


पत्ता गोभी खाना चाहिए या नहीं?
गुणकारी पत्ता गोभी को लेकर लोगों के मन में जो डर है
उसकी वजह वो कीड़ा है, जो पत्ता गोभी के सेवन से
हमारे शरीर में जा सकता है। इस कीड़े को टेपवर्म (Hook Worm) 
या फीताकृमि कहते है, जो सफेद धागे जैसा लंबा होता है। 
(पूरा आलेख पढ़िए...सावधानी ही बचाव है)


कांच का संसार ....
मायावी प्रकाश,
बनावटी समंदर की तल भूमि,
ऊपर उठते नन्हें बुलबुले,
नक़ली प्रवाल भित्ति,
फ़िरोज़ा लहरों मे कहीं,
कुछ ढूंढती सी है


मरने की चाहत होती जाती है ....
मुहब्बत क्या हुई  जैसे  इबादत होती जाती है|
कि सजदे में झुकने की आदत होती जाती है||

चलाओ तीर कितने भी सितम चाहे करो जितने|
जो उल्फत हो गई इक बार तो बस  होती जाती है ||


सागर की व्यथा ...
सागर तू आज कैसे है मौन ।
अंतस् भेद की गांठें खोल ।।
अचलता नहीं प्रकृति तेरी ।
चंचलता लहरों की चेरी ।।


कलपता सागर ...
पल-पल विलखती है वो ...
सर पटक-पटक कर तट पर,
शायद कहती है वो....
अपने मन की पीड़ा बार-बार रो रो कर,
लहर नहीं है ये....
है ये अनवरत बहते आँसू के सैलाब,
विवश सा है ये है फिर किन अनुबंधों में बंधकर....
....
बस..
कुछ रचनाएँ अधिक है आज
झेल लीजिएगा
सादर


Thursday, January 21, 2021

607 ..कुछ होश गंवाने के चर्चे, कुछ होश में फिर आ जाने के

सादर वन्दे
आखिर बिना किसी हंगामें के
शपथग्रहण हो ही गया
दोनों ताक रहे हैं अमेरिका की ओर
कौन दोनों
एक प्रश्न चिन्ह....

चाँद
चुपके से
खिड़की के रास्ते
कमरे में
रोज आता है
लड़की
अपने करीब आता देख
मुस्कुराती है
देखती है देर तक
छू लेती है
मन ही मन उसे

चिड़िया से ..ओंकार जी
क्यों चीं-चीं कर रही हो,
कौन है जो सुनेगा तुम्हें,
किसे फ़ुर्सत है इतनी,
सुनना भी चाहे,
तो इस भीषण कोलाहल में
किसके कानों तक पहुँच पाएगी
तुम्हारी कमज़ोर सी आवाज़?


कुछ होश गंवाने के चर्चे, कुछ होश में फिर आ जाने के, 
ये दोनों आलम कुछ भी नहीं, टुकड़े हैं मेरे अफ़साने के.. 
कुछ हैरत के आसार से हैं, कुछ दिल सा ठहरा रहता है, 
वहशत से गुजरते जाते हैं, अंदाज़ तेरे दीवाने के..

चले आयेंगे हम छुपकर जहाँ की उन निगाहों से 
जिन्होंने कल कहा था राह में काँटे बिछा देना 

बहुत दिन हो गए पकड़ी नहीं रेशम सी वो उँगली 
मेरी जुल्फों में धीरे से वही उँगली फिरा देना 


शेष प्रहर के स्वप्न होते हैं 
बहुत -ही प्रवाही, 
मंत्रमुग्ध सीढ़ियोंसे ले जाते हैं 
पाताल में, कुछ अंतरंग माया, 
कुछ सम्मोहित छाया, प्रेम, 
ग्लानि ढके रहते हैं 
धुंध के इंद्रजाल में, 
....
आज के लिए बस
सादर

 

Wednesday, January 20, 2021

606 ...मौसम की चतुराई को भांप लेती है नन्ही चिड़िया

सादर अभिवादन
बाइडन और कमला हैरिस का शपथ ग्रहण समारोह अमेरिकी समयानुसार 20 जनवरी को दोपहर 12 बजे शुरू होगा यानी भारत के समयानुसार रात 10.30 बजे ये कार्यक्रम होगा. बाइडन इसके बाद लोगों को संबोधित करेंगे और अगले चार सालों के कार्यकाल के लिए अपना विजन पेश करेंगे.  हमें क्या बदलाव मिलेगा ये प्रश्न चिन्ह है अभी पर आप आज की रचनाएँ देखें

क्या
फ़ायदा, ज्वार के साथ भाटे का
रहना है स्वाभाविक, हर
शख़्स के फ़ेहरिस्त
में, तरजीह के
पैमाने एक
नहीं
होते, मुश्किल है हर एक दिल से
अहमियत का
मिलना।


प्रमुख नदी है देश की,गोमुख उद्गम जानिए।
पंच प्रयागों से बनीं,पावन गंगा मानिए।।

आकर फिर ऋषिकेश में,चलतीं हरि के द्वार अब।
गढ़मुक्तेश्वर कानपुर,चलीं इलाहाबाद तब।।


उन्मुक्त गगन में उड़ते थे
आंखों में भी सपने थे
धूप छांव आती जाती
पर वो दिन भी अच्छे थे 
बेमौसम की गिरी बिजुरिया
कैसे पंख बचाना हो।।


मेरे आंचल में ठहरा है मौसम कोई 
एक मिसरा उसे भी सुनाओ ज़रा 

मेरी सांसों ने चुपके से मुझसे कहा -
'तुम हो "वर्षा", बरस के दिखाओ ज़रा'

द्रष्टा और दृश्य की परिभाषा
जन्म-मरण अहर्निश प्रत्याशा 
सोख लेती है अतृप्ति चिड़़िया
बूझो अगर तुम उसकी भाषा।
...
बस
सादर


Tuesday, January 19, 2021

605 ...दिख ही जाती है, वक्त की गहरी बुनावट! चेहरों की, दहलीज पर

सादर नमस्कार
कल जनवरी की बीसवीं तारीख
शपथग्रहण है अमेरिका में
काफी कुछ हंगामा करना सीख गया है
भारत से अमेरिका...
इसबार की चुनावी चकल्लस देख कर
ऐसा ही कुछ लग रहा है

देखिए आज का पिटारा...

कुछ उपेक्षित मलिन प्रदेश, हमेशा की
तरह रहते हैं ओझल, दीवार उठा
दिए जाते हैं रातों रात, नाले
के दोनों किनारे, लेकिन
सत्य को छुपाना
इतना भी
सहज


मन के ‘परदे’ पर 
यादों की फिल्म चलती है 
‘वह’ उसी तरह रहता है अलिप्त 
जैसे आँख के पर्दे पर 
चित्र बने अग्नि का तो जलती नहीं 


फिरे ढूँढते स्वर्ग जगत में
सारी दुनिया घूम गए।
स्वर्ग बसा माँ की गोदी में
उसको ही सब भूल गए।
सदा लुटाती माँ बच्चों पे
आशीषों की धूप छनी।


ज़िंदगी का दूसरा नाम 'जिंदादिली' है। 
जो कि बा-मुश्किल लोगों को मिली है।
बिन बारिश भी जो खुद को 
सूखने ना दे, 
पतन होने न दे 
उसी का नाम हरियाली है ।


जब मनुष्य सीखना बन्द कर देता है
तभी वह बूढ़ा होने लगता है
बुढ़ापा मनुष्य के चेहरे पर उतनी झुरियाँ नहीं  
जितनी उसके मन पर डाल देता है


उम्र, दे ही जाती हैं आहट!
दिख ही जाती है, वक्त की गहरी बुनावट!
चेहरों की, दहलीज पर, 
उभर आती हैं.....
आड़ी-टेढ़ी, वक्र रेखाओं सी ये झुर्रियाँ,
सहेजे, अनन्त स्मृतियाँ!

चलते-चलते 
गरमा-गरम
अभी अभी
देख कर उड़ा है ‘उलूक’
कुछ मुँह छुपा कर अपना

जो हुआ है
सब को पता है
जीत किसकी हुई
चोर चोर मौसेरे
घूँम रहे हैँ खुले आम

एक शरीफ अपना मुँह
चुल्लू मेँ
डुबाना चाहता है ।
....
आज बस
सादर

 

Monday, January 18, 2021

604 अनबन की गाँठ वाली अदरक को, कूट-पीटकर डाल देना

सादर अभिवादन
"इलाईची के दानों सा,
मुक़द्दर है अपना...!

महक उतनी ही बिखरती गई ...
जितने पिसते गए"..!!

कभी अपने लिये
कभी अपनों के लिये...!
.....
अब रचनाएँ
मन मेरा ....मन के पाखी


मन मेरा औघड़ मतवाला
पी प्रेम भरा हाला प्याला
मन मगन गीत गाये जोगी
चितचोर मेरा मुरलीवाला

मंदिर , मस्जिद न गुरुद्वारा
गिरिजा ,जग घूम लिया सारा
मन मदिर पिपासा तृप्त हुई
रस प्रीत में भीगा मन आला


ज़िंदगी की चाय !!! ....सदा

ज़िंदगी की चाय में
उबाल देना
सारे रंजो-ग़म
अनबन की गाँठ वाली अदरक को,
कूट-पीटकर डाल देना
जिसका तीखा सा स्वाद भी
बड़ा भला लगेगा,


तुम सुनो तो मैं सुनाऊँ ....'परचेत'

अजीब सी पशोपेश मे हूँ,
मैं इधर गाऊँ कि उधर गाऊँ?
इक गजल लिखी है मैंने तुमपर,
तुम सुनो तो मैं सुनाऊँ।

हो क़दरदान तुम बहुत,
गुल़रुखों के नगमा-ए-साज के,
तारों भरी रात,
नयनोँ मे बरसात,
धुन कौन सी बजाऊँ?


सिफारिश ....राग देवरन

माना बंदिशे हज़ारों हैं दिल की राहों में l
कुछ और नहीं तो खाब्बों में आ जाया करो ll

ख्यालों की गुलाबी घटाओं में रंग जाओ ऐसे l
संदेशों में मचल रहा हो कोई नादान समंदर जैसे ll
....
आज बस
कल शायद फिर
सादर


Sunday, January 17, 2021

603 ..अब के तो छा जाना, गलती मत दोहराना, मलहम आने वाला है

सादर वन्दे
परम्परा सी चल पड़ी है 
नाम बदलने की, 
फैजाबाद अयोध्या हुआ
इलाहाबाद 
प्रयाग राज हो गया..
अभी-अभी  सुना गया कि
माऊण्ट एवरेस्ट का नाम बदला जाए
और राधानाथ सिकदर किया जाए
क्या माऊण्ट एवरेस्ट
उत्तराखण्ड या हिमांचल में है?
इसी तारतम्य में  
एक सुझाव मेरी ओर से
दिल्ली का नाम भी 
बदल कर
खिसियानी बिल्ली 
रख दिया जाए 

चलिए रचनाए देखेंं


जिसे लोग बरगद समझते रहे, 
वो बहुत ही बौना निकला,
दूर से देखो तो लगे हक़ीक़ी, 
छू के देखा तो खिलौना निकला, 



जाड़ों की गुनगुनी धूप 
कितनी ममता-भरी है,
जब खड़ा होता हूँ,
तो हाथ रख देती है सिर पर,
सहलाती है गालों को,
जब लेटता हूँ,
तो थपकाती है पीठ,



एक युवा पुरुष को 
अलग अलग उम्र की स्त्रियां
अलग अलग स्वरूप में देखेंगी..
नन्ही बच्ची उसे पिता या भाई सा जानेगी..
युवा होगी तो झिझकेगी सकुचायेगी
उसमें सखा या मित्र खोजेगी..




ख़्वाहिशों की नुमू कब ठहरतीं है
आइनों को बगावतें सिखा रहें बहुत

सदाएँ मेरी फ़लक से टकराती रही
मश्क कर अब निस्बतें बढा रहें बहुत




नतमस्तक 
हो गया था 
साथ में
कुछ दुखी भी हो गया था 
कहीं भी
किसी भी खेत में
नहीं उग पाया था 
बहुत झल्लाया था 

इस बार 
चांस हाथ से नहीं जाने दूंगा 
चाहे धरती पलट जाये 
मौका भुना ही लूंगा

फिर से
क्योंकी लग रहा है कुछ होने वाला है 
सुगबुगाहट सी दिख रही है साफ 
पिछली बार के कलाकारों में
बस इस बार

सुना है
जल्दी ही इस बार वो
रामदेव हो जाने वाला है 
....
अब बस
पूरा उपयोग हो गया छुट्टी का
सादर