Tuesday, October 15, 2019

145..कूड़ा बीनते लोग भी कवि हो जाते हैं

सांध्य मुखरित मौन में आप सभी का
सादर अभिवादन
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15 अक्टूबर 1931
आज डॉ.कलाम का जन्मदिन है।
ए पी जे अब्दुल कलाम के विचार युवाओं के लिए बहुत ही प्रेरक हैं। अब्दुल कलाम आजाद भारत के 11 वें राष्ट्रपति थे इसके साथ ही साथ वो एक महान वैज्ञानिक भी थे जिन्हें “मिसाइल मैन” के नाम से भी जाना जाता है।
★★★★★★
आइये अब आज की रचनाएँ पढ़ते हैं- पौत्र ....

जब भी मैं देखती तुम्हें
मुझे याद आता एक साथ 
पीपल के मसृण पात 
और अपने कमजोर पड़ते गात 
प्रकृति का यही नियम 
नवीन का आगमन 
पुरातन का गमन

★★★★★

खुशी .....
बहुत भाव
खाती हो खुशी ?..
कुछ सीखो
अपनी बहन से...
हर दूसरे दिन आती है
हमसे मिलने..  "परेशानी"।

आती तो मैं भी हूं...
पर आप ध्यान नही देते।

★★★★★★

खुली हवा मे सांस ले सकें ....

दूषित हवाओं से मुक्ति हो
खुली हवा में सांस ले सकें
कौन यहां अवतारी होगा
जिससे थोड़ी आस ले सकें ।


अंधविश्वास

होम,हवन,यज्ञ,पूजा, ये सब दरसल एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें प्रयोग आने वाली सामग्री वातावरण को स्वच्छ करती हैं,कीटाणु से लड़ती है पर इसका आध्यात्म या किसी विशेष प्रकार की शक्ति से कोई संबंध नही जो हमारी या किसी वस्तु की रक्षा कर सके।

★★★★★★

उलूक  के पन्नों से

अभी
दिखा है
एक कवि

 कूड़ा
समुन्दर
के पास
बीन लेने
वाले को

सब कुछ
सारा
माफ होता है

बड़े
आदमी के
शब्द

नदी
हो जाते हैं

★★★★★

आज का अंक कैसा लगा?
आपकी प्रतिक्रियायेंं बहुमूल्य हैं।

#श्वेता


Monday, October 14, 2019

144...लिए मन की चादर कोरी सी ! !

स्नेहिल अभिवादन
आज तो लोग लिखे ही नहीं कुछ
चलिए आज एक ही ब्लॉग से रचनाएँ लाते हैं
आज का ब्लॉग है
क्षितिज
जाना पहचाना
ब्लॉगर हैं रेणुबाला

कोरे कागज पर उतर कर .
ये अमर हो जायेंगे ;
जब भी छन्दो में ढलेंगे ,
गीत मधुर हो जायेंगे ;
ना भूलूँ जिन्हें उम्र भर
बन प्रीत के तराने रहो तुम !

तुम  बिन थम जाएगा  साथी ,
मधुर गीतों का ये सफर ;
रुंध कंठ में  दम तोड़ देगें -
आत्मा के स्वर प्रखर ;
बसना मेरी मुस्कान में नित  
ना संग आंसुओं के बहना तुम

रूह से लिपटी जाय-
तनिक विलग ना होती,
रखूं   इसे संभाल -
जैसे सीप में मोती ;
सिमटी  इसके  बीच -
दर्द  हर चली भूल सी !!

कब  माँगा  था  तुम्हे
किसी दुआ  और प्रार्थना में ?
तुम कब थे समाहित -
मेरी     मौन अराधना में ?
आ गये अपने से बन क्यों
बंद ह्रदय के  द्वारे  ! !


मिटाती मलिनता  अंतस की 
मन  प्रान्तर  में आ बस जाए    
रूप   धरे  अलग -अलग  से -
मुग्ध,  अचम्भित  कर जाए 
किसी    पिया की है प्रतीक्षित   --  
लिए    मन   की  चादर   कोरी सी ! !

सखी रेणु काफी दिनों से ब्लॉग नहीं लिख रही है
लगता है...मन रम गया है श्रीकृष्ण में
सादर








Sunday, October 13, 2019

143....शब्द बच के निकल रहे होते हैं

आज शरद पूर्णिमा है..
पूरे सोलह कलाओं के साथ..
अमृत वर्षा करेंगे चन्द्रदेव..
आधी रात तक गरबा खेला जाएगा
आँख-मिचौली भी खेली जा सकती है
हमारे पास बातें फालतू नहीं है
चलिए लिंक की ओर...


शरद पूर्णिमा ...

क्या क़यामत ढा रही, है शरद की पूर्णिमा।
गीत उजले गा रही, है शरद की पूर्णिमा।

भेद करती है नहीं धनवान, निर्धन में ज़रा
पास सबके जा रही, है शरद की पूर्णिमा।



एक ठो खेला है, नाम है ''कौबक''

चलिए छोड़िये ! अपुन ने कौन सा इसमें हिस्सा लेना है या कोई आस लगा रखी है ! खेल चल रहा है, अवाम सम्मोहित है ! गरीब देश का मनई लोगन को जबरिया करोड़पति बनाने, देश को खुशहाल बनाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है ! अब ये तो समझ के बाहर की बात भी नहीं है कि कौन खुशहाल हो रहा है ! कोई तो हो ही रहा है ना ! अच्छी बात है ! जितने ज्यादा लोग अमीर होंगे, उतने और टी.वी. बिकेंगे ! और ज्यादा लोग उसे  देखेंगे ! और ज्यादा विज्ञापन झोंका जाएगा ! और ज्यादा बेकार, प्रयोजनहीन चीजों की बिक्री बढ़ेगी ! बाज़ार की सुरसा रूपी भूख को और ज्यादा खुराक मिलेगी ! पैसा बरसेगा ! एक करोड़, पांच करोड़, सात करोड़................
इस बार की धन राशि है दस करोड़ !!!


मैं जानता हूँ ....
एक दिन मैं गिर पडूँगा,
मेरे घुटने शायद छिल जाएँ  तब,
शायद तब पीछे मुड़कर देखूँगा,
टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों से गुज़रती...
अपने जीवन के साठवें  साल को,
जहाँ खोने के लिए अब  कुछ भी नहीं, 
कुछ यादों को बेशक संभालना चाहता हूँ

इस बार ...
इस बार मैं मिलने आऊँ,
तो ए .सी. बंद कर देना,
खिड़कियाँ खोल देना,
आने देना अन्दर तक
बारिश में भीगी हवाएं.

देखिए उलूक नामा क्या कहता है

समय
के साथ
लिखा लिखाया
हरे से पीला
हो लेता है

किताबें
पुरानी
हो जाती हैं

लिखाई
से
आती महक

उसकी उम्र
बता जाती है
.....
आज तो वाकई बन गई प्रस्तुति
हर बार अधूरी सी बनती थी
सादर...



Saturday, October 12, 2019

142..अक्ल पर पड़े पर्दे को समय से उठना भी पड़ता है

सादर अभिवादन..
शरद पूर्णिमा कल है...
पर आज महानायक का जन्मदिन है
आज वे 77 वाँ जन्मदिन मना रहे हैं
पहले उनकी फिल्म का एक गीत सुनते हैं
अमिताभ बच्चन..जी हाँ ...
वही जो कुली फिल्म मे चोटिल हुए थे
सादर अभिनन्दन व शुभकामनाएँ


चलें रचनाओँ ओर..

एक कवि, जब मर जाता है ....
चरणबद्ध तरीके से
बंद करता है एक-एक कपाट
प्रत्येक खिड़कियाँ, हरेक रोशनदान को;
जिनसे, बेबस कविताओं की
नन्हीं-नन्हीं कोंपलें झाँक रही होती हैं,
उसकी हर एक साँस को माप रही होती हैं।


दर्द का रिश्ता .....
निर्मलता की उपमा से,
क्यों प्रेम मलीन करूँ अपना,
तुम जानो अपनी सीमाएँ,
मैं जानूँ, तुम हो सपना !
साथ छोड़कर मत जाना,
भटकाव सँभलता है तुमसे !
बरसों से भूला बिसरा,
इक चेहरा मिलता है तुमसे !


मुर्दो ने पूछा ...
मुर्दो ने पूछा ,
आज यहाँ क्यों,
आये हो ,
क्या अपने घर ,
का रास्ता भूल ,
आये हो ,
मैंने कहा सुना था ,
भूत लोगो को ,
डराते है ,
कभी सपने में ,
को कभी सामने ,
आ जाते है |


वही शख्स पुराना लगता है ....
My Photo
कोई लकल्लुफ नही रहा गुफ्तगू मे
ताल्लुकात बहुत पुराना लगता है

हमकलाम हुए है हम कई दफा सुरज से
हमारा महताब पर आना जाना लगता है


भेद का पर्दा ...

कभी होता है जरुरी हटना भी
पर पर्दे का कई बार
हो जो अगर पड़ा अक्ल पर
और समय से उठना भी
प्रदर्शन शुरु होने से पहले
किसी भी मंच पर
और हाँ !!! ...
हटा रहे मन से भी
हर एक भेद का पर्दा 

आज के लिए इतना ही..
सादर





Friday, October 11, 2019

141...एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली...


सादर अभिवादन। 

सांध्य दैनिक 
मुखरित मौन की प्रस्तुति में 
आपका स्वागत है। 
आइये अब आपको आज की 
पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-


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चित्र साभार : गूगल 

एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली
और हम लुटे-लुटे वक्त से पिटे-पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।




"तुमलोगों को इस देश का विकास पसंद नहीं, विकास के रास्ते में आने वाले बाधाओं को दूर किया ही जाता है। तुम पल भर में धरा से गगन नाप लेती हो.. मनुष्यों के पास पँख नहीं तो वे जड़ हो जायें क्या ? तुम्हारे आश्रय यहाँ नहीं तो और कहीं.." भूमिगत रेल आवाज चिंघाड़ पड़ी।

 

टपकते आँसू पाकीज़ा नन्हीं  आँखों से  

ठहर गयीं धड़कनें बिखर गयीं साँसें 
कूद पड़े प्रबल प्रेम के प्रतापी 
परिवार के सात अन्य हाथी 
अर्पित की सभी ने साँसें अपनी 

बचाने अपना एक नन्हा प्यारा साथी  





जो गुफ़्तगू मायने समझाता फिरता था
हरेक ख्यालात का 
किस्सा-कहानी सा लगता है अब वो 



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सच में ये हमारी परम्परा तो नहीं है . हमारी परम्परा 'लिंचिंगकी नहीं 'पिंचिंगकी रही है . इसके लिए किसी हथियारथप्पड़-लातों की ज़रूरत नहीं होती. बस ज़ुबान की ज़रूरत होती है . आप तानों का पिटारा खोलकरजलीकटीलगीबुझी सुनाकर किसी को भी मुफ्त में ही चारों खाने चित्त कर सकते हैं . यहाँ पिंचिंग में 'हींग लगे फिटकडीरंग आए चोखो', वाली कहावत भी चरितार्थ हो जाती है . औरकिसी न्यायिक लफड़े में फंसने की सम्भावना भी बहुत कम होती है . तभी तो सालों बीत जाने के बाद भी पिंचिंग यानि चिकोटी काटने की यह परम्परा बदस्तूर जारी है .





रामायण को पढना सभी के लिए संभव नहीं और अखंड रामायण का पाठ भी सभी को अपने आदर्श राम के चरित्र से उस तरह नहीं जोड़ पाते जिस तरह रामानंद सागर जी की रामायण सभी को जोड़ देती है और इसी कारण आजकल रामलीला के दौरान लोग इसे कहीं घर में तो कहीं विभिन्न समूहों द्वारा किये गए आयोजन में देखने के लिए समय से पहले पहुँच लेते हैं और बाकायदा प्रशाद भी चढाते हैं और ये सब देख यही लगता है कि रामायण बनवाने के लिए रामानंद सागर जी को स्वयं भगवान् ने ही प्रेरणा दी होगी और रामानंद सागर जी को इस पुण्य कर्म के लिए स्वयं भगवान राम ने ही चुना होगा.


आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति में। 

रवीन्द्र सिंह यादव