Thursday, July 18, 2019

56...न आने की बात वो ख़ुद कहकर गया है

सादर अभिवादन...
चलेगा कुछ दिन ऐसा ही
हम ही हम दिखेंगे
जैसे पाँच लिंकों का आनन्द में दिखे थे
लोग जुड़ते जा रहे हैं
कारवाँ तो बनेगा ही
चलिए देखिए आज की प्रकाशित रचनाएँ

"जो बीड़ा उठाया है समाज का बुखार उतारने का वो खुद के लिये साधारण बुखार का बहाना कैसे बना सकता है 
या समाज सेवा का बुखार उतर गया ?"
"ना दीदी! ना! हरारत बरसात का असर है... 
एक भोरे से रात तक खड़े रहना , सब काम करना..,"
"सुनो! ज्यादा पैरवी नहीं करो...! जोखिम काम का 
बीड़ा उठाई हैं तो इतना करना ही पड़ेगा... और अभी 
बिना सहयोगी का कर रही हैं तो झेलना ही पड़ेगा..

छू कर, जरा सा... बस, 
गुजर सी गई थी इक एहसास! 
थम सा चुका था, ये वक्त, 
किसी पर्वत सा, जड़! यथावत! 
गुजरती ही नहीं थी, आँखो से वो तस्वीर, 
निरर्थक थी सारी कोशिशें, 
दूर कहीं जाने की, बस, 

हर क्षण हर पल आदमी गहरी नींद में विश्राम करता,
स्वप्न के आकाश में फड़फड़ाता और
विचारों के बहाव में बहता हुआ ज़िंदगी जीता रहता है।
अपनी परिपूर्ण मानसिक अवस्था का 
परिपूर्ण स्मरण रखनेवालों को ही 
इस सच्चाई का एहसास होता रहा होगा।

ख़ुशियाँ उड़ें, जले यादों की आग में तन-मन 
समझ न आए, ये इश्क़ भी है कैसी उलझन 

न आने की बात वो ख़ुद कहकर गया है मुझसे 
फिर भी छोड़े न दिल मेरा, उम्मीद का दामन 

एक रात थी 
बरसात की
चन्द लम्हों का सफर था वो 

हमने तय किया उस सफर को 
सदियों से लम्बा

आज के लिए बस
कल अनीता जी आएँगी
सादर
यशोदा











Wednesday, July 17, 2019

55....बकवास ही कर, कभी अच्छी भी कर लिया कर

सादर अभिवादन
आज हमारी बारी
सांध्य दैनिक चल पड़ा
गलतियाँ हो रही है
और जायज भी है...
आज की चुनी रचनाएं आज ही प्रकाशित होनी है
और सूचना में तारीख कल की जा रही है
खास कर मुझसे तो नहीं होनी चाहिए...
पर हो गई...हमारे पाठक बहुत सहनशील हैं
चलिए देखिए आज क्या है...

धरा ने आज देखो
स्वयंवर है रच्यो ।

चंद्रमल्लिका हार
सुशोभित सज्यो।

नव पल्लव नर्म उर
चूनर धानी रंग्यो।


विदाई, पल ये फिर आई, 
बदरी सावन की, नयनन में छाई, 
बूँदों से, ये गगरी भर आई, 
रोके सकें कैसे, इन अँसुवन को, 
ये लहर, ये भँवर खारेपन की, 
रख देती हैं, झक-झोर!


"बिलकुल जुड़ जाना चाहिए... 
तभी कुछ भ्रांतियाँ नष्ट होंगी।" 
अदालिया ने कहा।
"कानून बन चुका है,ऐसे बच्चे घर-परिवार से 
दूर नहीं किए जाएंगे।" एर्मिना ने कहा।
"समाज भी साथ दे इसलिये तो यह आयोजन किया गया है,
"इलिना का कहना था।
"हर घर-परिवार-समाज में विभीषण होता है! 
करोड़ों के उगाही का खपत कहाँ होगा..?" 
विशालकाय मानव के साथी ने कहा।


समस्याओं का सामना करो ।
विडंबनाओं से लोहा लो ।
गुरुदेव ने कहा,
और उतार दी नौका
भव सागर में ।

इससे पहले उन्होंने
सिर पर हाथ रखा
और हाथ में रख दी
सबसे बड़ी पूँजी
नारायण की चवन्नी ।


' ये क्या लिख भेजा ?'
' आपने क्या माँगा था?' 
'यात्रा वृत्तांत के लिए कहा था।'
'हम्म '
' हम्म नहीं। यात्रा वृत्तांत भेजिए।'
' इस बार कहानी चला लीजिए।'
'बिलकुल नहीं।'
(इस ब्लॉग में कमेंट की पॉसिबिलिटी नही है)


एक जाने-माने अखबार की कतरन

बिना पढ़े 
बस देखे देखे 
रोज लिख देना 
ठीक नहीं 

कभी किसी दिन 
थोड़ा सा 
लिखने के लिये 
कुछ पढ़ भी
लिया कर 

सभी 
लिख रहे हैं 
सफेद पर 
काले से काला 

आज भी अतिक्रमण कर बैठी..
आज्ञा दें
यशोदा



Tuesday, July 16, 2019

54....मेघ हैं आकाश में कितने घने.....

स्नेहाभिवादन !
कल से सावन मास का आरम्भ ..
हरी भरी वसुन्धरा मरकत से रंगों सजी..
सावन के झूले और तीज का त्यौहार..
भगवान शिव की आराधना और रक्षाबंधन का त्यौहार…
इस महीने में कलमकारों की लेखनी का जादू मन के
कोमल और भक्ति भावों को उकेरने के लिए खूब चलेगा । 
फिलहाल आज की सांध्य प्रस्तुति के सूत्रों का आनन्द लीजिए---

मेघ हैं आकाश में कितने घने
लौट कर आए हैं घर में सब जने  

चिर प्रतीक्षा बारिशों की हो रही   
बूँद अब तक बादलों में सो रही
हैं हवा में कागजों की कत-रने
मेघ हैं आकाश में …

भोर भई अब जागो लाल!
मुँह उठाय रँभाइ रही गैया,
बाट देखि रहे ग्वाल।
उदय भये रवि किरण पसारीं,
अम्बर से उतराईं।
चूँ चूँ करती चुगने दाना,
चिड़ियाँ आँगन में आईं।

टुकड़ों में नींद
मुट्ठी भर याद
कुछ अधूरी सी बात
और बेहिसाब एकांत

दौड़ना स्वस्थ शरीर के लिए एक बेहद आवश्यक क्रिया है
जिसके द्वारा, शरीर की आंतरिक प्रतिरक्षा शक्ति, शरीर
के विभिन्न अवयवों को वाइब्रेट कर स्फूर्ति प्राप्त करती है !
दुर्भाग्य से आज के समय में बेहतरीन विद्वान भी इस विषय
(मानवीय  प्रतिरक्षा शक्ति) को अछूता छोड़े हुए हैं और
भौतिक सुख सुविधाओं का उपयोग, अपने शरीर को
आराम देने में प्रयुक्त कर रहे हैं !

संवाद से कहीं ज्यादा
जहरीला होता है मौन
मन में छुपी कड़वाहट
समझ पाया क्या कौन

गिले-शिकवे दूर हो जाते
संवाद जो दरमियान हो जाते
गलतफहमियों की दीवारें
ख़ामोशियाँ भला कैसे मिटाएँ

********
शुभ संध्या
🙏🙏
मीना भारद्वाज

Monday, July 15, 2019

53 ... वर्षों हुए , इस दिल को टटोले.....

स्नेहाभिवादन !
आज की सांध्य प्रस्तुति पूरी तरह काव्यात्मक..
मन के कोमल भावों की अभिव्यक्ति से सुसज्जित चन्द
रचनाएँ जिनमें चिन्तन-मनन का अनूठा सामंजस्य है----

कुछ 
लेखक होते हैं बुरा भी नहीं है 

कुछ 
लेखक पैदा 
नहीं होते है 

माहौल 
बना देता है 

इक दौड़ था, इन धड़कनों में, जब शोर था,
गूँजती थी, दिल की बातें,
जगाती थी, वो कितनी ही रातें,
अब है गुमसुम सा, वो खुद बेचारा!
है वक्त का, ये खेल सारा,
बेरहम, वक्त के, पाश में जकड़ा,
भाव-शून्य है, बिन भावनाओं में डोले!

वर्षों हुए थे, इस दिल को टटोले.....

उमड़-घुमड़ कर छाए बादल,
गरज-गरज के छाए बादल।
नवजीवन के सृजनकर्ता,
झूम-झूम के बरसो बादल।

कृषकों के दिल हर्षाए बादल,
राग-मल्हार गाए बादल,
क्रांति का गीत सुनाने वाले,
गरज-गरज के बरसो बादल।

मेरे तपते जीवन पर थी माँ तुम हुलसित छाया
सूरज को नित आँख दिखाती गुलमोहर की माया

पाँव पड़े थे छाले मेरे या डगमग पग डोले
बिन बोले भी भाव समझकर भेद जिया के खोले

जो संवेदनाएं नहीं होती 
पत्थरों में 
चिंगारी नहीं फूटी होती 
इनके घर्षण से 
न ही जन्म लेती आग।  

जो संवेदनाएं नहीं होतीं 
पत्थरों में 
कहाँ पिसी होती गेंहूं 
पकी होती रोटी 

पत्थरों ने 
अपनी साँसे रोक कर 
सहा जो नहीं होता 
छेनियों की धार 
और हथौरों की चोट 
गढ़े नहीं गए होते बुद्ध

*******
इजाजत दें ...शुभ संध्या 🙏
मीना भारद्वाज



Sunday, July 14, 2019

52...ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था

सादर अभिवादन
कल हम तनिक से भी अधिक व्यस्त थे
फिर भी व्यवधान नही हुआ
कल शाम की प्रकाशित रचनाएँ...

आसपास की महिलाओं में प्रथम स्थान माँ का ही आता है उनसे समझ 
और धैर्य लिया तो जीवन सँवरता गया.. बाद में उनसे ही मिलता जुलता 
रूप हमारे बड़े भैया का रहा जो राह दिखलाने में सारथी बने , जिंदगी 
जब भी उलझने लगी समझ और धैर्य पतवार बने.. आगे बढ़ने 
पर बेटा ऊँगली थाम लिया.


प्यार करने वाले दीवाने कभी डरते नहीं। 
लोग मजनूं कहते हैं मगर वो चिढ़ते नहीं। 

मेरा दिल तोड़ा है तुमने गए दास्ता लिखकर। 
अब नहीं मिल सकोगे हमसे तुम कभी हसकर। 



वो आषाढ़ का पहला दिन था 
मगर मैं अज्ञात उनसे मिलने चला 
टिक-टिकी 4:45 की ओर इशारा कर रही थी 
घनघोर घटा उमड़ रहे थे 
मानो उनका भी मिलन महीनों बाद आज ही होने वाला था 
वैसे मैं भी महीनों बाद ही मिलने वाला था

आकर हाथों की हद में सितारे छूट जाते हैं
हमेशा ख़्वाब रातों के सुबह में टूट जाते हैं।

मंजर खूब लुभाते हैं, वादियों के मगर
छूटते पटाखों से भरम बस टूट जाते हैं ।


अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी
द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को निहार रही थी ।
तभी, श्रीकृष्ण कक्ष में दाखिल होते हैं…
द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है …
कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं…
थोड़ी देर में, उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बैठा देते हैं।
द्रोपदी: यह क्या हो गया सखा ??
ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था
आज
अब
बस
थकावट सी है
यशोदा...


Saturday, July 13, 2019

51..खोल पंख फिर उड़ो गगन मेंं....


स्नेहाभिवादन !
सांध्य दैनिक मुखरित मौन का तीसरा अंक 
सप्ताहांत की सांध्य वेला में आज की प्रस्तुति 
आपके समक्ष पेश है -–-

अपना अपना सपना देखो
उन सपनों में अपना देखो
तुझे सजन मिलना मुमकिन तब
सदा खोज तू उसे स्वजन में
खोल पंख फिर उड़ो गगन में

कविता रोटी नहीं देती। रोटी को बाँट कर खाने की तमीज देती है। रोटी को झपटने का उकसावा कोई और ताकत देती है। तमीज और  झपटमारी में टकराव होता रहता है। कविता इस झपटमारी उकसावा के विरुद्ध आत्म-संशय के व्यूह से बाहर निकलने का धीरज देती है।

एक दशक पहले मिला था उससे मेरे साथ ही कॉलेज में पढ़ाई करती थी। उसके बाद कुछ महीने पहले उसे वाराणसी के घाट पर बैठे देखा, एक बार में उसे पहचान नहीं सका पहचानता भी कैसे हर समय मुस्कान का आवरण ओढ़े रहने वाली आज इतनी शांत.. भावहीन चेहरा।

कभी-कभी तो आते हो
नखरे बीस दिखाते हो ।
पानी भी लाते हो कम ।।
बादल भैया बदले तुम ।

जब जी चाहे आते हो
सौ तूफान उठाते हो ।
करते खूब नाक में दम ।।
बादल भैया बदले तुम ।

संवाद तभी तक बातचीत रहती है जब तक हम सहमति और
असहमति में संतुलित बने रहते हैं
अन्यथा असहमती अपने साथ क्रोध लेकर आती हैं और
संवाद खत्म हो जाता हैं।
ऩिदा फ़ाजली साहब ने सही फरमाया हैं...........
बात कम कीजे जहानत को छिपाते रहिये
अजनबी शहर है ये,  दोस्त बनाते रहिये
दुश्मनी लाख सही, ख़त्म  ना कीजे रिश्ता
दिल मिले ना मिले, हाथ मिलाते रहिये

*******
यशोदा...







Friday, July 12, 2019

50....कहते कहते ही कैसे होते हैं कभी थोड़ी देर से भी होते हैं

सांध्य दैनिक का दूसरा दिन
सादर अभिवादन..


आज बहन अनीता को आना था
शिड्यूल शाम का है
अंदाजा नहीं होगा
आ जाएगी समझ....धीरे से...


चलिए हमें ही झेल लीजिए...
आज की अब तक प्रकाशित रचनाएँ...


"अभी मैं अपने उच्च पदाधिकारी के साथ आ रहा था तो बहू के कमरे की खिड़की से पर्दा उड़ रहा था और बहू बिना सर पर आँचल रखे पलंग पर बैठी नजर आ रही थी। पदाधिकारी महोदय ने कहा भी प्रसाद जी वो आपकी बहू है ? खिड़की के पर्दे पर कांटी ठोकवा देता हूँ ! तुम कितने साल घूँघट में रही हो...।"


तो जाने क्‍यूँ ....
वो रिश्ते लड़खड़ाने लगते है 
नाम से रिश्ते तो बन्ध जाते है !
पर बेनाम आगे बढ़ते जाते है 
न कोई बंधन और न ही कोई सहारा 
सच्ची मुस्कान लिए होते है 


बहते चिनाब से, 
मिल गई, इक किताब! 
उम्र, जो है अब ढ़ली, 
सोचता था, 
गुजर चुकी है, 
अब वो गली, 
अब न है राफ्ता, 
शायद, अब बन्द हो वो रास्ता, 
पर, टूटा न था वास्ता, 


My photo
बालकों की कल्पना-शक्ति के उद्भव, विकास और संवर्द्धन में बाल-साहित्य का अप्रतिम योगदान रहा है. पंचतंत्र, रामायण, महाभारत, जातक-कथाएं, दादी-नानी की कहानियों में उड़ने वाली परियों की गाथा, भूत-प्रेत-चुड़ैलों की चटपटी कहानियां, चन्द्रकान्ता जैसी फंतास और तिलस्म के मकड़जाल का वृत्तांत और स्थानीय लोक कथाओं के रंग में रंगी रचनाएँ सर्वदा से बाल मन को कल्पना के कल्पतरु की सुखद छाया की शीतलता से सराबोर कराती रही हैं. 


उजाला और अँधेरा, जैसे एक ही सिक्के के दो पहलु ! पर उजास को जहां ज्ञान, जीवन, उत्साह, शुचिता और जीवंतता का प्रतीक माना जाता है, वहीं अंधकार को निराशा, हताशा, अज्ञान या अमंगल का पर्याय मान लिया गया है। पर एक सच्चाई यह भी है कि आज भी ब्रह्मांड में इसका अस्तित्व उजाले से कहीं ज्यादा है, चाहे उसका विस्तार अनंत अंतरिक्ष में हो, चाहे सागर की अतल गहराइयों में ! 


प्यार की है फिर ज़रूरत दरमियाँ 
हर तरफ हैं नफरतों की आँधियाँ 

नफरतों में बांटकर हमको यहाँ 
ख़ुद वो पाते जा रहे हैं कुर्सियाँ 

खुलके वो तो जी रहे हैं ज़िन्दगी 
नफ़रतें हैं बस हमारे दरमियाँ 

परिवेश ....

शीशे पर जमी है
धूल ही धूल 
पारदर्शी
पानी भी न रहा 
शक्ल अब
एक-दूसरे की
आँखों में देखो 
शर्म होगी तो
ढक लेंगीं पलकें
पुतलियों को 
आदमी की बेशर्मी का
कोई सानी भी न रहा।  



टलते-टलते
टलना तो है ही
चलिए ठाले-बैठे टल जाते हैं


तुम तो पीछे ही 
पड़ गये दिनों के 
दिन तो दिन होते हैं 
अच्छे और बुरे 
नहीं होते हैं 
अच्छी और बुरी 
तो सोच होती है 
उसी में कुछ ना कुछ 
कहीं ना कहीं 
कोई लोच होती है 
सब की समझ में 
सब कुछ अच्छी 
तरह आ जाये 
ऐसा भी नहीं होता है"

रचनाएँ 
आज आठ हैं
कल से एक ज्यादा
जोश का क्या है
उबल ही पड़ता है
कहते हैं न
नया मुल्ला कुछ
ज़ियादा ही प्याज खाता है
सादर
दिग्विजय..