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Thursday, February 22, 2018

भरोसा..क्षणिकाएँ......अनुराग अन्वेषी


जो कहते हैं
कि खुद के अलावा
किसी और पर नहीं कर सकते भरोसा
दरअसल, वह खुद की निगाह में
भरोसे के लायक नहीं होते।

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यह पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं
कि आशंकाएं जहां खत्म होती हैं
वहीं से शुरू होती है
भरोसे की दुनिया

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जो मानते हैं
कि दूसरों पर भरोसा जताना
खुद पर से भरोसे का उठ जाना होता है
या फिर अपने भरोसे की मजबूती को और बढ़ाने का
एक शातिराना चाल होता है
ठीक से टटोलें उनकी जिंदगी
वहां उपलब्धि कम, ज्यादा मलाल होता है
-अनुराग अन्वेषी
ए-802, जनसत्ता सोसाइटी, सेक्टर 9,
वसुंधरा, गाजियाबाद 201012 (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल : 9999572266

Thursday, February 15, 2018

उसका हंसना याद आ रहा है...केशव शरण

न संगीत, न फूल
उसका हंसना
याद आ रहा है
संगीत का बिखरना
और फूलों का झरना
याद आ रहा है
याद आ रहा है
मेरा मर मिटना
उसकी उस दिलकश हंसी पर
और इसी के साथ
आ रहा है रोना
उसका दुखी, बीमार
उदास होना
क्या बताऊं
अखर रहा है
किस क़दर
कुछ इस क़दर
कि न संगीत अच्छा लग रहा है
न फूल अच्छे लग रहे
-केशव शरण

Tuesday, February 6, 2018

बात दिल की अब समझता है कौन.....आरती आलोक वर्मा



आंखों का दरिया छुपाने के लिये
मुस्कुराते  हैं      जमाने  के लिये ।।

बात दिल की अब समझता है कौन
जायें किसको गम दिखाने के लिये ।।

हां, हमे मजबूत होना ही पड़ा
राह से पत्थर  हटाने के लिये  ।।

सर झुकाना मंजूर कर "आरती "
फ़ासले दिल के मिटाने के लिये ।।

Saturday, February 3, 2018

यक़ीं उतना मुझे ख़ुद पर नहीं है....सुभाष पाठक ‘जिया’

किसी  से आस तुझको गर नहीं है
तो दिल के टूटने का  डर नहीं  है,

उसे रोता  हुआ देखा  किया मैं
कहूँ  कैसे कि दिल पत्थर नहीं है,

यक़ीं  जितना किया है मैंने तुझ पर
यक़ीं उतना  मुझे ख़ुद पर नहीं है,

ये दिल क्या चीज़ है मैं जान दे दूँ,
तेरी उल्फ़त से  कुछ  बढ़कर नहीं है,

किया है क़त्ल उसने इस अदा  से
कि ख़ूँ का दाग़ दामन पर नहीं है,

हुआ है  हादसा अंदर  कहीं कुछ,
जो हलचल जिस्म के बाहर नहीं है,

कहाँ जाकर 'ज़िया' रोयूँ ग़मे दिल,
कि सहरा में कोई भी दर नहीं है,

सुभाष पाठक ‘जिया’