Sunday, January 12, 2020

234..'मैं जिधर चाहूंगा पहाड़ उधर को ही खिसकेगा'

आज स्वामी विवेकानन्द जी जयन्ती है
वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा
12 जनवरी,1863 - मृत्यु: 4 जुलाई,1902

अध्यात्मिक सहिष्णुता, राष्ट्रीयता और वैचारिक साहस के प्रतीक तथा युवाओं के आदर्श पुरुष स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर युवाओं से अपेक्षा करता हूं स्वामी जी के जीवन और शिक्षाओं का गहन अध्ययन करें और प्रेरणा लें।

यदि आप सफल होना चाहते हैं तो आपके अंदर एक जबरदस्त दृढ़ इच्छाशक्ति होनी चाहिए। 'मैं पूरा समुद्र पी जाऊंगा' या 'मैं जिधर चाहूंगा पहाड़ उधर को ही खिसकेगा', ऐसा कोई दृढ़ आत्मा ही कह सकती है। आपके भीतर ऐसी ही दृढ़ ऊर्जा और इच्छाशक्ति होनी चाहिए। किसी के भीतर ऐसा संकल्प हो और वह कठिन परिश्रम करे तो किसी भी मुश्किल लक्ष्य को भेद सकता है।

सादर अभिवादन
हमारे अंदर भी दृढ़ साहस है
हम भी अपने मुखरित मौन को
मृत्यु पर्यन्त चालू रख सकते हैं
..
चलें आज की रचनाओं की ओर ...

मैं बदलता भारत देख रहा हूँ
मैं युवा भारत की आहट  सुन रहा  हूँ
मैं ये सोच आनंदित हो रहा हूँ  कि
लक्ष्य निर्धारित कर ,कर्म पथ पर चले तुम
मिले मार्ग मे शूल ,निडर बढ़ते चले तुम
सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर खड़े
सपनोँ को पूरा करने की ऊँची उड़ान भरे तुम ।

अपनी मिट्टी छोड़कर....तुम
किसी और जमीं की महक लेने जा रहे हो 
जाओ.....
उस जमीं के साथ
एक खुला, नया सा आसमां
तुम्हारी उड़ान देखने तत्पर है


सहनशक्ति
ओढ़कर सो जाते 
आवारा कुत्ते!

चन्द टुकड़े
रोटियाँ खाकरके
पूँछ हिलाते।

चौकीदारी से
हक़ अदा करते
आवारा कुत्ते!
...
आज बस इतना ही
सादर


2 comments:

  1. बहुत अच्छी संध्या दैनिक मुखरित मौन प्रस्तुति

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