Wednesday, July 29, 2020

430..करना होगा हर मुहावरे में परिवर्तन, हमारे संविधान-सा

सादर अभिवादन
29 जुलाई ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार 
वर्ष का 211 वाँ दिन है। 
साल में अभी और 155 दिन बाकी है।
उपरोक्त कथन सिर्फ जानकारी हेतु
खुशियां न मनाएं

चलिए रचनाओँ की ओर ...

अक़्सर जीते हैं 
आए दिन 
हम कुछ 
मुहावरों का सच,
मसलन ....
'गिरगिट का रंग',
'रंगा सियार'
'हाथी के दाँत',
'दो मुँहा साँप'
'आस्तीन और साँप',
'आँत की माप'
वग़ैरह-वग़ैरह ..
वैसे ये सारे 
जानवर तो 
हैं बस बदनाम,
बस यूँ ही 



जिस साल
बीज बहा था जलधारा में
गद्दी पर बैठे राजा ने
आश्वासनों को बांधकर भेजा था कागज़ में
जो मौसम की मार खाते-खाते
किसानों तक पहुँचते - पहुँचते
बह गये लालच के तूफान में
जब मुआवज़े की रकम को
लिखते-लिखते टूट गई थी
सरकारी बाबू की कलम
दर्ज होंगे इतिहास के पन्नों पर
चमगादड़ बन लटके किसानों की लाशें



मन के सतह पर
तैरते अनुत्तरित 
 प्रश्न
महसूस होते हैं
गहरे जुड़े हुये...
किसी 
रहस्यमयमयी
अनजान,
कभी न सूखने वाले
जलस्त्रोत की तरह..,


गंभीर वृक्ष की शीतल छाँव 
उसमें उलझी-सी टोह
फिर वही लताओं की डोर-सी लगेगी
कभी अनुभव-सिरों पर बैठी ठौर-सी मिलेगी...
यह सही है
उस समय तुम अकेले रहोगे
फ़ासले
चिलचिलाती तेज़ धूप-से लगेंगे


मैं खुले दर के किसी घर का हूं सामां प्यारे
तू दबे-पांव कभी आ के चुरा ले मुझ को

कल की बात और है मैं अब सा रहूं या न रहूं
जितना जी चाहे तिरा आज सता ले मुझ को

वादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊं 'क़तील'
शर्त ये है कोई बांहों में संभाले मुझ को
....
इति शुभम्
सादर

4 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  2. सुन्दर प्रस्तुति।

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  3. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति। मेरी रचना को स्थान देने हेतु सादर आभार।

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