जुलाई का दूसरा दिन
शांत-शांत सा है....
लोगों को इन्तजार है
सावन का..
बहुत कुछ होता है सावन में...
अब लगता है सूनापन सहेगा सावन
आज की रचनाओँ से लगता है कि
लोग भयभीत हैं...क्यों
अब रचनाओं की ओर चलें .....
शान तिरंगा है ....
शान तिरंगा है, अपनी आन तिरंगा है ।
सारी दुनिया से कह दो सम्मान तिरंगा है।
वीरों ने कुर्बानी दे कर इसे सजाया है,
देशभक्ति गौरवगाथा का गान तिरंगा है।
बुरा क्या है सज़ा क्या है जज़ा क्या है ...
न आना इश्क़ के बाज़ार में अंधी तिजारत है
दिया क्या है लिया क्या है बिका क्या है बचा क्या है
ज़माना झूम उट्ठा है सदा-ए-दाद आती है
न जाने आज 'माहम' ने ग़ज़ल में कह दिया क्या है
सरहद .....
स्वयं का नाम सुना होगा सरहद ने जब
मोरनी-सी मन ही मन हर्षाई होगी।
अस्तित्त्व अदृश्य पानी की परत-सा पाया
भाग्य थाम अँजुली में इतराई होगी।
जिंदगी से दूर होने लगते हैं ......
जीवन रंग विहीन हो स्वयं से जब दूर होने लगताहै।
अपने काम से जब मन स्वयं असन्तुष्ट रहने लगता है।
मन की दशा जब कागज पर उकेरे मोर सी होती,
जो बरसात तो देखता पर पँख फैला नाच नहीं सकता ।।
कैसी यह जंग ....
ख़ूनी रिश्तों को घेरा
खलाओं ने
जीवन और मृत्यु
खड़े हैं स्तब्ध
न जन्मे का स्वागत
न मरे को अलविदा
काल की रुखाई ने
छीन लिया अपनापा
किसे ख़बर कब थमेगा
यह अज़ाब का सिलसिला।
शब्द ..
ऐसा लग रहा है
ब्लॉग मे सालों बाद आई हूँ
आती भी नहीं
एक कविता पढ़ी मैं आज...
प्रतिक्रिया लिखते-लिखते
वहीं रम गई...
आप भी पढ़िए वो प्रतिक्रिया..
जो ढल गई कविता सी...
....
बस..
और आऊँगी
'गर समय मिला
सादर
शांत-शांत सा है....
लोगों को इन्तजार है
सावन का..
बहुत कुछ होता है सावन में...
अब लगता है सूनापन सहेगा सावन
आज की रचनाओँ से लगता है कि
लोग भयभीत हैं...क्यों
अब रचनाओं की ओर चलें .....
शान तिरंगा है ....
शान तिरंगा है, अपनी आन तिरंगा है ।
सारी दुनिया से कह दो सम्मान तिरंगा है।
वीरों ने कुर्बानी दे कर इसे सजाया है,
देशभक्ति गौरवगाथा का गान तिरंगा है।
बुरा क्या है सज़ा क्या है जज़ा क्या है ...
न आना इश्क़ के बाज़ार में अंधी तिजारत है
दिया क्या है लिया क्या है बिका क्या है बचा क्या है
ज़माना झूम उट्ठा है सदा-ए-दाद आती है
न जाने आज 'माहम' ने ग़ज़ल में कह दिया क्या है
सरहद .....
स्वयं का नाम सुना होगा सरहद ने जब
मोरनी-सी मन ही मन हर्षाई होगी।
अस्तित्त्व अदृश्य पानी की परत-सा पाया
भाग्य थाम अँजुली में इतराई होगी।
जिंदगी से दूर होने लगते हैं ......
जीवन रंग विहीन हो स्वयं से जब दूर होने लगताहै।
अपने काम से जब मन स्वयं असन्तुष्ट रहने लगता है।
मन की दशा जब कागज पर उकेरे मोर सी होती,
जो बरसात तो देखता पर पँख फैला नाच नहीं सकता ।।
कैसी यह जंग ....
ख़ूनी रिश्तों को घेरा
खलाओं ने
जीवन और मृत्यु
खड़े हैं स्तब्ध
न जन्मे का स्वागत
न मरे को अलविदा
काल की रुखाई ने
छीन लिया अपनापा
किसे ख़बर कब थमेगा
यह अज़ाब का सिलसिला।
शब्द ..
ऐसा लग रहा है
ब्लॉग मे सालों बाद आई हूँ
आती भी नहीं
एक कविता पढ़ी मैं आज...
प्रतिक्रिया लिखते-लिखते
वहीं रम गई...
आप भी पढ़िए वो प्रतिक्रिया..
जो ढल गई कविता सी...
....
बस..
और आऊँगी
'गर समय मिला
सादर
सचमुच भय व्याप्त है, बहुत खूबसूरत प्रस्तुति
ReplyDeleteसादर आभार आदरणीय दिव्या जी मेरे सृजन को स्थान देने हेतु .बेहतरीन प्रस्तुति है आज की .
ReplyDeleteदिव्या जी,
ReplyDeleteबहुत सुंदर प्रस्तुति!
सभी रचनाएँ बहुत अच्छी हैं और सभी रचनाकारों को शुभकामनाएं
शुक्रिया दिव्या जी हमारी रचना को शामिल करने के लिए। सभी रचनाएँ बहुत सुन्दर है।
ReplyDeleteउम्दा संकलन
ReplyDeleteबहुत सुंदर
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