Tuesday, August 27, 2019

96...धूप में कुम्हलाना मत ....

 स्नेहाभिवादन !
"सांध्य दैनिक मुखरित मौन" की प्रस्तुति में 
मेरी ओर से आप सब का हार्दिक स्वागत …
अब आपके समक्ष पेश हैं ...
आज के चयनित सूत्र---


समय की गणना के लिए सप्ताह एकमात्र ऐसी इकाई है जो किसी प्राकृतिक घटना पर आधारित नहीं है । समय की अन्य सभी इकाइयां जैसे, वर्ष, महीना, दिन, घटी, घंटा, किसी न किसी प्राकृतिक घटना से संबंद्ध हैं । चंद्रमा की घटती-बढ़ती कलाओं के आधार पर दिनों की गणना की प्रक्रिया आदिम लोगों ने प्रारंभ की थी, किसी गणितज्ञ या वैज्ञानिक ने नहीं ।

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सूने घर में किस तरह सहेजूँ मन को।
पहले तो लगा कि अब आईं तुम, आकर
अब हँसी की लहरें काँपी दीवारों पर
खिड़कियाँ खुलीं अब लिये किसी आनन को।

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धूप से कुम्हलाता पौधा देखा है? जो कहीं थोड़ी सी छाँव तलाशता दिखे? कैसे पता होता है पौधे को कि छाँव किधर होगी... उधर से आती हवा में थोड़ी रौशनी कम होगी, थोड़ी ठंड ज़्यादा? किसी लता के टेंड्रिल हवा में से माप लेंगे थोड़ी छाँव?

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हवाओं में ऐसी ख़ुशबू पहले कभी न थी
ये चाल बहकी बहकी पहले कभी न थी

ज़ुल्फ़ ने खुलके उसका चेहरा छुपा लिया
घटा आसमा पे ऐसी पहले कभी न थी

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यूँ बातों में कहें लोग कुछ भला-बुरा 
 नहीं मगर यह दिल बदला आघात में

 क्या दिन थे जब बैठे हम बिन बात भी
 अब फुरसत है कहाँ किसे दिन रात में

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शुभ संध्या
🙏
"मीना भारद्वाज"

7 comments:

  1. व्वाहहहह...
    बेहतरीन अंक..
    सादर..

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  2. बेहतरीन रचना संकलन एवं प्रस्तुति सभी रचनाएं उत्तम

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  3. बेहद खुबसुरत रचवाओं का संकलन है आपका :)

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  4. वाह बेहतरीन रचनाओं का संगम।एक से बढ़कर एक प्रस्तुति।
    BhojpuriSong.in

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  5. सुन्दर लंकलन
    आभार आपका !

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