Thursday, September 30, 2021

776 ..ठाढ़ा सिंह चरावै गाई का ना ऐसा हाल था

 सादर अभिवादन

कल का उपवास
मन को हल्का कर गया
आभार जिउतिया
....
रचनाएँ....



मचल कर, मखमली सवालों में!
वो अक्सर, आ ‌‌‌‌‌ही जाते हैं, ख्यालों में!

न बदली, अब तक, उनकी शोखियां,
वो ही रंग, अब भी, वो ही खुश्बू,
और वही, नादानियां,
वो अक्सर, कर ही जाते हैं ख्यालों में!




हिलते हाथों से
गजरा लगाते देखा है।
चढ़ती उम्र के साथ
प्यार को भी चढ़ते देखा है।



जीवन के अनसुलझे,
रहस्यमयी प्रश्नों
विपश्यना,
"मैं से मोक्ष"
की यात्रा में
तुम ही
निमित्त
बन सकते हो
कदाचित्।




ठाढ़ा सिंह चरावै गाई का
ना ऐसा हाल था
चींटी मुख में हाथी
समा जाए का काल था
गार्गी सूर्या मैत्रयी सुलभा के बाद आयी
सावित्री बाई अरुणा सुचेता दुर्गा बाई
उत्‍तमोत्‍तम ओजोन थीं


तृण शीर्ष पर कुछ ओस बूंद, देते हैं
आख़री सहारा झरते हुए पारिजात को,
दूरत्व तो होता है बस एक बहाना,
हर कोई चाहता है ज़िन्दगी को

सादर

3 comments:

  1. असीम शुभकामनाओं के संग हार्दिक आभार आपका
    श्रमसाध्य प्रस्तुति हेतु साधुवाद

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  2. सुंदर सार्थक रचनाओं का संकलन।

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