Friday, March 19, 2021

665 ..इस जहां के हज़ार कांटों में इक महकता गुलाब है औरत


सादर अभिवादन

"अगर आप लोगों के बीच
अपनी ही बात करते रहेंगे तो,
आप केवल वहीं दोहराते रहेगे
जो आप जानते है,

परन्तु दूसरों की भी सुनेंगे तो
आप नया भी सीखते जायेंगे."
..
रचनाओंकी ओर चलें ..

मेरी सहेलियों ने मुझ से कहा कि
बेटे-बहू के पास रहने बिल्कुल नहीं जाना
क्योंकि कमाने वाली बहू को
बुजुर्ग सास बिल्कुल अच्छी नहीं लगती।
पर ये सच नहीं..


जन्म-मरण के
प्राकृतिक चक्र की
सरल परिभाषा को
जोड़ती
काल्पनिक, अदृश्य रेखा
उम्र के हर घुमाव पर
गहरी होती जाती है।


रोज़ सुबह तुम, मुझको जगाना  
गाके मधुर गाना, तू प्यारी गौरैया ।।

मेरे घर मेरे घर आना, तू प्यारी गौरैया

पर्यावरण की तुम हो सहेली
रूठ नहीं जाना, तू प्यारी गौरैया ।।


जिनके श्रम से
चहल-पहल है
फैली है
चेहरों पर लाली
वे शिव हैं
अभिशप्त समय के
लिये कुण्डली में
कंगाली
जिस पल शिव,
शंकर में बदले
मुश्किल है ताण्डव सह पाना


इस जहां के हज़ार कांटों में
इक महकता गुलाब है औरत

इसमें दुर्गा, इसी में मीरा भी
आधी दुनिया की आब है औरत

जोड़, बाकी, बटा, गुणा "वर्षा"
ज़िन्दगी का हिसाब है औरत


चलते-चलते
सिर्फ 19 सेकेंड और जाया कीजिए..उपरी हिस्सा भी देख लीजिए



बस आज्ञा दें
सादर

6 comments:

  1. बहुत बढ़िया लिंक्स। मेरी रचना को सांध्य दैनिक मुखरित मौन में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, यशोदा दी।

    ReplyDelete
  2. आदरणीय यशोदा जी,शानदार लिंक्स के चयन एवम संयोजन के श्रमसाध्य कार्य हेतु आपका हार्दिक आभार एवम नमन,मेरी रचना को शामिल करने के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

    ReplyDelete
  3. यशोदा जी मेरी रचना को शामिल करने के लिए आपका बहुत आभार...लिंक्स का चयन अति उत्तम 👌👌

    ReplyDelete
  4. सारे ही लिंक्स एक से बढ़ कर एक। सभी पढ़ लिए। आभार ।

    ReplyDelete
  5. सुंदर लिंक सुंदर प्रस्तुति।

    ReplyDelete
  6. प्रिय यशोदा अग्रवाल जी,
    हार्दिक आभार .... आपने मेरी ग़ज़ल की पंक्तियों को शीर्षक में स्थान दे कर मुझे जो सम्मान दिया है उसके लिए मैं आपके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित कर रही हूं 🙏
    सदैव ही आप बहुत श्रमपूर्वक लिंक्स का संयोजन करती हैं। नमन आपके इस श्रम को 🙏
    हार्दिक शुभकामनाओं सहित,
    डॉ. वर्षा सिंह

    ReplyDelete