Tuesday, September 15, 2020

479..तनिक सहज, होने लगा हूँ मैं अभी,

 सादर वन्दे
मन विचलित है
सही नहीं हुआ मन
काम करने की इच्छा
मानो मर सी गई है

फिर भी चलिए आज की रचनाओं का ओर

सार्वभौम सत्ता का स्वप्न रहा
अपूर्ण, शुद्धोधन का हठयोग  
न  रोक सका सिद्धार्थ
का पथ, समस्त
मायामोह के
बंधन
तोड़ वो एक दिन हुआ बुद्ध, - -


सेहर से शाम शाम से सेहर तक 
ज़िन्दगी मानों एक बंद कमरे तक 
कभी किवाड़ खोलकर झांकने तक 
तो कभी शुष्क हवा साँसों में भरने तक 
ज़िन्दगी मानों अपनी सीमा के सीमा तक 
बहुत त्याग मांगती  रहती हैं जब तक 


क्या ​अब
भी सोचते हो,
जन्नत पाओगे मरने के बाद,
​गलत सोचते हो तुम,
अब जहन्नुम मे
ढकेल दिए जाओगे,
क्या पाया तुमने,
ए कत्ले आम करके?


पल सारे इन्तजार के, अब हो चले है सूने,
सहज एहसास, चुनने लगा हूँ मैं,
कोई राग बन कर, सीने में उतर आओगे!
असहज, इस मन को कर जाओगे!

Photo Of Woman Walking On Hallway
दो पत्थर हैं जो नहीं पिघलते
एक छाती में धधकता लावा है
दूसरा बालों में
तुम्हारी उँगलियों के निशान वाला
चकमक पत्थर

लोग जिसे अस्थि पंजर समझते हैं
वो एक इश्क़ का मक़बरा है
....

बस
कल की कल
सादर



4 comments:

  1. असंख्य धन्यवाद - - सुन्दर प्रस्तुति एवं संकलन, तहे दिल से आपका शुक्रिया - - नमन सह।

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  2. मेरी रचना के अंश को शीर्षक का रूप देने के लिए आभार....

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  3. बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपका अभिनंदन। वाकई रचनाएँ पढकर अच्छा लगा। सत्य और प्रेरणादायी रचना हैं।

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  4. वाकई सुन्दर प्रस्तुति एवं संकलन, तहे दिल से आपका शुक्रिया !

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