Sunday, September 6, 2020

470..अफ़सोस है दशरथ को

 सादर अभिवादन..
आज बिना किसी
लिखा-पढ़ी के
सीधे रचनाओँ का ओर

little golden fish
मेरे ऐक्वेरियम की वो नन्हीं फिश
देखो जीना हमें है सिखा रही
है बंधी फिर भी उन्मुक्त सोच से
काँच घर  को समन्दर बना रही

अफ़सोस है दशरथ को,
अयोध्यापति है वह,
पर उसके वश में नहीं है 
नुकसान की भरपाई करना.


इक रात ऐसी भी है,जब नींद नही थी आंखों में, 
सब कुछ था,साथ भी था.. 
फिर भी एक अकेलापन,बेचैनी थी मन मे, 
क्या इसी रात के लिए मैं अब तक भागे जा रही थी, 


महा अंधकार गहराता हुआ, फिर
उठे हैं कपासी मेघदल, हर
चेहरे में है डूबने का
भय, लेकिन
किनारे,
अभी तक, अपनी जगह हैं अचल।


राज कई जीवन से लेके
बुनती हूँ ताने-बाने।
आस पिरोती माला बुनती
सपने जाने पहचाने।
बस आज इतना ही
सादर
-

4 comments:

  1. सुन्दर संकलन.मेरी कविता शामिल करने के लिए आभार.

    ReplyDelete
  2. बहुत सुंदर अंक।

    ReplyDelete
  3. असंख्य धन्यवाद, सुन्दर संकलन व प्रस्तुति - - नमन सह।

    ReplyDelete
  4. बहुत सुंदर संकलन, मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीया।

    ReplyDelete