Monday, December 7, 2020

562 ..गमलों में पनपते बोनसाई की तरह जीने की विवशता ने सीमित कर दिया अर्जित ज्ञान

सादर वन्दे..
आज फेसबुक में एक स्टेटस
दिखाई पड़ी अक्षरशः प्रस्तुत है
आभार दीदी को 

विश्व में कोई भी व्यक्ति पूर्ण "संस्कारी" नहीं है,
इसीलिए ...शायद ... मरने के बाद ही,
उसे "अंतिम संस्कार" मिलता है
अब चलिए रचनाओं की ओर..

शीतकाल के अंत में, 
जब महुआ पेड़ के पल्लव विहीन 
टहनियों में उभरते हैं पुष्प शंकु, 
उस पतझर के मौसम में 
अरण्य -नदी ख़ुद को 
अपने ही में समेट कर बहे जाती है, 





चल री गुलाबो 
सुबह सुबह अपने मुख पर 
हम भी धूल का उबटन लगा लेते हैं 
वो कोठी वाली मेम साब की तरह 
हम भी अपना चेहरा 
अच्छी तरह से चमका लेते हैं ! 





हे उद्धार कारणी  मुझे अवगुणों  से दूर रखना
मन के अंधेरे को ज्ञान ज्योति का प्रकाश देना
पंकज सी निर्मलता मेरी जिन्दगी को प्रदान कर
मेरी  राहों को अपनी आशीष का वरदान देना!!
माँ शारदे वर दे.....





धान ,गेहूँ,दलहन,तिलहन
कपास के फसलों के लिए
बीज की गुणवत्ता
उचित तापमान,पानी की माप
मिट्टी के प्रकार,खाद की मात्रा
निराई,गुड़ाई या कटाई का
सही समय
मौसम और मानसून का प्रभाव
भूगोल की किताब में
पढ़ा था मैंने भी
पर गमलों में पनपते
बोनसाई की तरह जीने की
विवशता ने
सीमित कर दिया
अर्जित ज्ञान। 


वो पहली नज़र में देखना तुमको,
देखके तुमको यूँ मेरा तड़पना।
और फिर इस दिल का धड़कना,
इज़हार-ए- मोहब्बत को मेरा झिझकना।
....
बस
सादर..




7 comments:

  1. बहुत सुन्दर..
    आभार..
    सादर..

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  2. बहुत बढिए। मेरी रचना को स्थान देने के लिए विशेष आभार।

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  3. सराहनीय प्रस्तुतीकरण
    उम्दा लिंक्स चयन

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  4. सुंदर लिंक्स।

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुतिकरण,हमारी रचना को स्थान देने के लिए आभार।

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  6. मुझे आने में बहुत विलम्ब हो गया ! क्षमाप्रार्थी हूँ दिव्या जी ! आपका बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार इतने सुन्दर सूत्रों से सजे संकलन में मेरी रचना को सम्मिलित करने के लिए ! हृदय से सप्रेम वन्दे आपको !

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  7. मोतियों की तरह दमकता मुखरित मौन, सुन्दर संकलन व प्रस्तुति के साथ हमेशा प्रेरित करता है, मुझे स्थान देने हेतु ह्रदय तल से आभार, सभी रचनाएं अपने आप में अद्वितीय हैं - - नमन सह। महुआ के फूलों के लिए आपका असंख्य धन्यवाद, कविता को नया आयाम जिसे मिला हो, नमन सह।

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