Wednesday, January 24, 2018

ना .....री .....डॉ. इन्दिरा गुप्ता

पल पल लांछित होती नारी
मूक निहारे दुनियाँ सारी
नारी को ही जागना होगा
तभी मिटेगी ये व्यभिचारी !

बिखरे भाव समेटने होगे
रक्ताभ नयन पुनि करने होगे
ज्वाला सी धधको तुम जग में
तजो विवशता और लाचारी !

नारी का मतलब है ना ....री
सर झुका काहे तू हारी
असत्य का प्रतिरोध करो तुम
दोयम दर्जा तू तो ना ...री !

घर समाज की धुरी तू है
काहे की लघुता लाचारी
उठो झाड़ लो धूल समय की
निरीह नहीँ तू है बलशाली !

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍


3 comments:

  1. नारी पर लिखी यह रचना बहुत ही सुंदर
    और प्रेरणा देने वाली है

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  2. नारी को अपनी शक्ति पहचाननी होगी ... जागृत होना होगा स्वयं को मानना होगा ...

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