सादर नमस्कार
आज हम हैं
घर से बाहर नहीं निकले
इसीलिए हैं..
लीजिए आज की मिली-जुली रचनाएँ
एक कहानी सूरज नारायण की

एक परिवार में रहते तो केवल तीन सदस्य थे ,पर महिलाओं में आपस में बिल्कुल नहीं बनती थी | सारे दिन आपस में झगडती रहती थी । घर में सारे दिन की कलह से सूरज नारायण बहुत तंग आ चुका था | न तो घर में कोई बरकत रह गई थी और न ही कोई रौनक | यदि कोई अतिथि आता ,सास बहू के व्यबहार से वह भी दुखी होकर जाता | धीरे धीरे घर के वातावरण से उकता कर वह घर से बाहर अधिक रहने
लगा| जब इतने से भी बात नहीं बनी ,एक दिन शान्ति की तलाश में सूरज ने घर छोड़ दिया|
'बेबसी'

देर सुबह जगा तो झुग्गी का द्वार बन्द था, पत्नी जो हमेशा उससे पहले उठ जाती थी आज निश्चेत सी लेटी थी।उसे उठाने के लिए छुआ तो सन्न रह गया।पत्नी का बदन बुखार से तप रहा था पास में लेटा बच्चा भी जोर-जोर से खाँस रहा था ।उसने उठने की कोशिश की तो उसका सिर चकराने लगा। बुरी आशंका से उसका हृदय काँप उठा।
सामने पड़ी राशन की थैलियाँ उसे मुँह चिढ़ा रही थी.......।
स्त्री और सम्मान...

एक स्त्री के लिए
प्रेम से बढ़कर भी
कुछ हो सकता है,
तो वो है सम्मान
या रिस्पेक्ट..।
बड़ों का फर्ज ....

उसकी इस क्रिया को उसके निकट घास चरता हुआ एक साँढ़ बड़ी तन्मयता से देख रहा था।उसने गाय से पूछा-तुमको इतनी रोटियाँ खाने के लिए मिलती हैं जिसे खाकर तम्हारा पेट भर जाता।पर, तुम उन प्राणियों के आगे बढ़ते ही उनके लिए रोटियाँ छोड़ दी।क्या तुम्हें रोटियाँ अच्छी नहीं लगती।
गाय बोली- मुझे रोटियाँ अच्छी तो बहुत लगती हैं।लेकिन उतनी रोटियों से मेरा पेट नहीं भरता।अगर मैं उनके लिए रोटियाँ छोड़ दी तो उनकी भूख तो मिटी।मैं तो अपना पेट घास खाकर भी भर लूँगी।लेकिन कुछ जीव एैसे हैं जो घास नहीं खा सकते।उनके लिए रोटियाँ उपयोगी थीं।
एक अंतहीन सफर का झूठा अंत ....

"अम्मा!
अब नहीं चला जाता है,
पैर दुखने लगे हैं |"
"अब अरे ऊ... देख सामने हमारे गांव की बस्ती नज़र आ रही है।
बस थोड़ा सब्र कर बिटिया हम पहुंचने ही वाले हैं|"
"क्या अम्मा, काहे तू झूठ बोल रही है!
"दूई दिन से तोहार ई बात सुन-सुनकर हमार कान पक गईल बा....
ऐ दिदीया!!
सादर
आभार..
आज हम हैं
घर से बाहर नहीं निकले
इसीलिए हैं..
लीजिए आज की मिली-जुली रचनाएँ
एक कहानी सूरज नारायण की

एक परिवार में रहते तो केवल तीन सदस्य थे ,पर महिलाओं में आपस में बिल्कुल नहीं बनती थी | सारे दिन आपस में झगडती रहती थी । घर में सारे दिन की कलह से सूरज नारायण बहुत तंग आ चुका था | न तो घर में कोई बरकत रह गई थी और न ही कोई रौनक | यदि कोई अतिथि आता ,सास बहू के व्यबहार से वह भी दुखी होकर जाता | धीरे धीरे घर के वातावरण से उकता कर वह घर से बाहर अधिक रहने
लगा| जब इतने से भी बात नहीं बनी ,एक दिन शान्ति की तलाश में सूरज ने घर छोड़ दिया|
'बेबसी'
देर सुबह जगा तो झुग्गी का द्वार बन्द था, पत्नी जो हमेशा उससे पहले उठ जाती थी आज निश्चेत सी लेटी थी।उसे उठाने के लिए छुआ तो सन्न रह गया।पत्नी का बदन बुखार से तप रहा था पास में लेटा बच्चा भी जोर-जोर से खाँस रहा था ।उसने उठने की कोशिश की तो उसका सिर चकराने लगा। बुरी आशंका से उसका हृदय काँप उठा।
सामने पड़ी राशन की थैलियाँ उसे मुँह चिढ़ा रही थी.......।
स्त्री और सम्मान...

एक स्त्री के लिए
प्रेम से बढ़कर भी
कुछ हो सकता है,
तो वो है सम्मान
या रिस्पेक्ट..।
बड़ों का फर्ज ....

उसकी इस क्रिया को उसके निकट घास चरता हुआ एक साँढ़ बड़ी तन्मयता से देख रहा था।उसने गाय से पूछा-तुमको इतनी रोटियाँ खाने के लिए मिलती हैं जिसे खाकर तम्हारा पेट भर जाता।पर, तुम उन प्राणियों के आगे बढ़ते ही उनके लिए रोटियाँ छोड़ दी।क्या तुम्हें रोटियाँ अच्छी नहीं लगती।
गाय बोली- मुझे रोटियाँ अच्छी तो बहुत लगती हैं।लेकिन उतनी रोटियों से मेरा पेट नहीं भरता।अगर मैं उनके लिए रोटियाँ छोड़ दी तो उनकी भूख तो मिटी।मैं तो अपना पेट घास खाकर भी भर लूँगी।लेकिन कुछ जीव एैसे हैं जो घास नहीं खा सकते।उनके लिए रोटियाँ उपयोगी थीं।
एक अंतहीन सफर का झूठा अंत ....

"अम्मा!
अब नहीं चला जाता है,
पैर दुखने लगे हैं |"
"अब अरे ऊ... देख सामने हमारे गांव की बस्ती नज़र आ रही है।
बस थोड़ा सब्र कर बिटिया हम पहुंचने ही वाले हैं|"
"क्या अम्मा, काहे तू झूठ बोल रही है!
"दूई दिन से तोहार ई बात सुन-सुनकर हमार कान पक गईल बा....
ऐ दिदीया!!
सादर
आभार..
जबरदस्त लघुकथाएँ
ReplyDeleteसम-सामयिक
सादर
शानदार साँध्य मुखरित मौन में मेरी बेबसी को स्थान देने हेतु तहेदिल से धन्यवाद आपका।
ReplyDeleteसभी रचनाएं बेहद उत्कृष्ट...
सभी रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनाएं।
उत्कृष्ट रचनाओं का संगम ।सभी रचनाएँ सुंदर।मेरी रचना को साझा करने के लिए हार्दिक धन्यबाद एवं प्रणाम।
ReplyDeleteदर्द, त्याग, प्रेम को समाहित करते अंक के लिए साधुवाद
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