दरार ..... महेन्द्र मद्धेशिया
"हां"
'कौन सा कोर्स चुना'
"लॉ"
कविता के हाथ ठिठक गए, मां ने हैरानी से बेटी की ओर देखा
तुम तो इंजीयरिग करना चाहती थी न ..
चाहती तो थी मां पर अब कानून पढ़ूंगी
"अचानक"
बेटी ने पानी का गिलास मेज पर रक्खा पानी की सतह में
हलकी सी लहर उठी और पल भर में थम गई
अचानक नहीं ..धीरे-धीरे
समझी नहीं?
जब बुआ को दहेज के कारण घर छोड़ना पड़ा ...मां चुप रही
फिर जब पड़ोस वाली दीदी ने न्याय की गुहार लगाई और लोगों ने दोषियां पर नही
उन्हीं के चरित्र पर सवाल उठाए तभी तह कर लिया कि अब कानून ही पढ़ना है
कुछ देर बाद कविता ने धीमे से पूछा तो ...कानून पढ़कर क्या करोगी
बेटी मुस्कुराई..
दरार गिनने से क्या होगा मां, मैं उन दीवारों के तह तक पहुंचना चाहती हूं
जहां से ये दरारें शुरू होती है
निर्माण सीखने की बजाय
दरारों की समझ नें रुचि लेने वाली बेटी ने
मां को आश्चर्य में डाल दिया
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