बूंद भर खुशबू
हर त्योहार दादी संदूक से एक छोटी -सी इत्र की शीशी निकालती।
उंगली पर बस एक बूंद लगाती और शीशी वापस रख देती।
मैं हंस कर पूछता 'दादी , इतनी -सी?' वे मुस्कुरी भर देती।
उंगली पर बस एक बूंद लगाती और शीशी वापस रख देती।
मैं हंस कर पूछता 'दादी , इतनी -सी?' वे मुस्कुरी भर देती।
उसके जाने के बाद अलमारी समेटते हुए
वही शीशी हाथ लगी।
नीचे एक पुरानी पर्ची दबी थी, पहली तनख्वाह से इन्होंनें खरीदी थी।
वही शीशी हाथ लगी।
नीचे एक पुरानी पर्ची दबी थी, पहली तनख्वाह से इन्होंनें खरीदी थी।
उसी क्षण समझ में आया दादी इत्र नहीं बचा रही थी,
उस दिन की खुशबू बचा रही थी,
जब उनके छोटे-से संसार ने पहली बार महकना शुरू किया था।
उस दिन की खुशबू बचा रही थी,
जब उनके छोटे-से संसार ने पहली बार महकना शुरू किया था।
उस एक बूँद नें पूरी उम्र की खुशबू सम्हाले रक्खी थी
-जयवीर सिंह , लुधियाना
-जयवीर सिंह , लुधियाना
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