* विश्वास *
उच्च शिक्षा के लिए मां अपनी बेटी को दूसरे शहर भेज रही थी।
दोनों ट्रेन की प्रतीक्षा कर रही थी
दोनों ट्रेन की प्रतीक्षा कर रही थी
मां मुस्कुराई और बोली मंजिल मिले ना मिले बस
अपने सपनों का साथ मत छोड़ना, मुझे तेरी सफलता से अधिक
तेरे साहस पर भरोसा है ...
इतने में ट्रेन प्लेटफार्म पर आ लगी, प्रज्ञा ने मां को गले लगाया,
मां की साहस भरी सीख प्रज्ञा के मन में विश्वास बन कर उतर चुकी थी
मां की साहस भरी सीख प्रज्ञा के मन में विश्वास बन कर उतर चुकी थी
ट्रेन आगे बढ़ी दोनों की मुस्कान कह रही थी अब डर नहीं,
साहस व सपनों के साथ सफर पर निकल पड़ा था
- वाणी भारद्वाज

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