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Tuesday, July 23, 2019

61....हौसलों की उड़ान...

स्नेहाभिवादन !
स्वागत आप सब का आज की 
"सांध्य दैनिक मुखरित मौन' की प्रस्तुति में..
पेश है आज मेरी पसन्द की चुनिंदा रचनाओं के सूत्र...


जब से बहेलिये ने चिड़िया को अपना कर देख भाल करने का फैसला किया है ;  तभी से चिड़िया सहमी हुई तो थी ही ,लेकिन में विचारमग्न भी थी ।वह कैसे भूल जाती बहेलिये का अत्याचार -दुराचार । उसने ना केवल उसके 'पर' नोच कर  उसे लहुलुहान किया बल्कि उसके तन और आत्मा को भी कुचल दिया था।  अब फैसला चिड़िया को करना था , पिंजरा लिए सामने बहेलिया था  । " मेरे परों में अब भी हौसलों की उड़ान है !" कहते हुए उसने खुले आसमान में उड़ान भर ली ।
        

मेरा तो समय ही नहीं बचता है..! बेटी यहीं डॉक्टर है, गाहे-बगाहे अक्सर आ जाती है.. उसके बच्चे हैं..! कभी बैंगलोर चली जाती हूँ..!आप सामाजिक कार्यों के लिए कैसे समय निकाल लेती हैं? ओह्ह अकेले रहती हैं न..! आप अपने बेटे बहू के पास कब जा रही हैं ?" पुरानी परिचित समाजिक मिलन समारोह में सबकी उपस्थिति का फायदा उठा रही थीं प्रचार-प्रसार कर सकें कि वो बहुत सुखी हैं।


अच्छों की दुनिया अच्छी ही होती है
ऐसा नहीं की की बुराई नहीं आती
मुश्किलें नहीं आती
आती तो है कठिनाइयां बहुत आती हैं
परंतुअच्छा सोचने वालों के लिए
 हर मुश्किल भी अच्छाई की ओर 
ले जाने वाली सीढ़ियां बन जाती है



बूंदे.....
गूंजित हुई कड़कडा़ती बिजली
चमकदार प्रकाश पहुँँचा हर ओर 
अचानक व्याप्त शांति में ,हुआ कुछ शोर
कौंधती किरणों ने ,आखों में सपना जगाया
आँखें बंद होते ही फिर ख्याल तेरा आया


अब  नहीं हो! दुनिया के लिए, 
 तुम तनिक  भी अंजाने, चाँद!
 सब जान गए राज तुम्हारा 
 तुम इतने  भी नहीं सुहाने, चाँद! 

बहुत भरमाया सदियों तुमने ,
 गढ़ी एक झूठी कहानी थी;
 रही  वह तस्वीर एक धुंधली  ,
नहीं कोई सूत कातती नानी थी;
बने युगों से बच्चों के मामा -
 क्या कभी आये लाड़ जताने?चाँद !

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इजाजत दें , फिर मिलेंगे..
शुभ संध्या
🙏🙏
मीना भारद्वाज