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Friday, July 19, 2019

57-- चुपचाप बहे चले जाते हो,


दिन ढले 
धोरे की ढलान ढलता
गडरिया,
फोगों बीच
चरती भेड़ों के गले
बजती घंटियों के सुर।
सचमुच,
यही है-
दुनिया की बेहतरीन कविता।
-- सत्यनारायण  सोनी 

चलिये बढ़ते है,आज के सङ्कलन की 
 ओर  मेरी  प्रथम प्रस्तुति |
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सरस्वती वंदना

पुलकित पल्लव,सुरभित मुकुल,
कुमुद,खग कलरव करत वंदना 
सोम,मुकुंदा,शिव,गंग,सविता 
पद विमला की करत अर्चना 
नृत राग,रागिनी,भू,नभ,उदधि,
कोपल,बाली करे रंजना
हे वाग्देवी हे ज्ञान की सरिता 

ब्रह्मपुत्र,
बहुत दिनों बाद मिला हूँ तुमसे,
कुछ सूख से गए हो तुम,
कुछ उदास से लगते हो,
कौन सा ग़म है तुम्हें,
किस बात से परेशान हो?

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हाशिए से उन्वान का सफ़र नहीं आसां,
हर एक मोड़ पर हैं पेंच बेशुमार, 
न थाम सीढ़ियों को इतने 
सख़्त हाथों से, अपनों  
ने ही मुझे गिराया 
है कई बार। 

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जंगलों की कच्ची गन्ध सहेजते
शिराओं-सी पगडण्डियाँ
मोहक लगती हैं मुझे 
पहुँचते हैं पथिक ठौर पर
पगडण्डियाँ नहीं पहुँचतीं

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My Photo
अटक जाती है साँस कभी
कभी जीवन भी अटक जाता है

अटकी हुई बात कोई
घुटन हो  

कंठ में ही नहीं 
रोम-रोम जब रुदन हो  

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सादर
- अनीता  सैनी