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Tuesday, July 16, 2019

54....मेघ हैं आकाश में कितने घने.....

स्नेहाभिवादन !
कल से सावन मास का आरम्भ ..
हरी भरी वसुन्धरा मरकत से रंगों सजी..
सावन के झूले और तीज का त्यौहार..
भगवान शिव की आराधना और रक्षाबंधन का त्यौहार…
इस महीने में कलमकारों की लेखनी का जादू मन के
कोमल और भक्ति भावों को उकेरने के लिए खूब चलेगा । 
फिलहाल आज की सांध्य प्रस्तुति के सूत्रों का आनन्द लीजिए---

मेघ हैं आकाश में कितने घने
लौट कर आए हैं घर में सब जने  

चिर प्रतीक्षा बारिशों की हो रही   
बूँद अब तक बादलों में सो रही
हैं हवा में कागजों की कत-रने
मेघ हैं आकाश में …

भोर भई अब जागो लाल!
मुँह उठाय रँभाइ रही गैया,
बाट देखि रहे ग्वाल।
उदय भये रवि किरण पसारीं,
अम्बर से उतराईं।
चूँ चूँ करती चुगने दाना,
चिड़ियाँ आँगन में आईं।

टुकड़ों में नींद
मुट्ठी भर याद
कुछ अधूरी सी बात
और बेहिसाब एकांत

दौड़ना स्वस्थ शरीर के लिए एक बेहद आवश्यक क्रिया है
जिसके द्वारा, शरीर की आंतरिक प्रतिरक्षा शक्ति, शरीर
के विभिन्न अवयवों को वाइब्रेट कर स्फूर्ति प्राप्त करती है !
दुर्भाग्य से आज के समय में बेहतरीन विद्वान भी इस विषय
(मानवीय  प्रतिरक्षा शक्ति) को अछूता छोड़े हुए हैं और
भौतिक सुख सुविधाओं का उपयोग, अपने शरीर को
आराम देने में प्रयुक्त कर रहे हैं !

संवाद से कहीं ज्यादा
जहरीला होता है मौन
मन में छुपी कड़वाहट
समझ पाया क्या कौन

गिले-शिकवे दूर हो जाते
संवाद जो दरमियान हो जाते
गलतफहमियों की दीवारें
ख़ामोशियाँ भला कैसे मिटाएँ

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शुभ संध्या
🙏🙏
मीना भारद्वाज