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Wednesday, May 20, 2020

360..न आदि है, ना ही अंत है! उन चेतनाओं में

सादर अभिवादन
घनघोर बादल
कड़कती बिजलियां
तेज चलती हवाएँ
पर अफसोस
जल की एक बूँद भी नहीं
नहीं है यहां पर
अम्फान का कहर
शुक्र है ....
चलिए रचनाएं देखें....

न छनछन पायल बजती है
न छन-छन के धूप आती है
लेकिन स्वाद होंठों पर है प्रेम का ऐसा
कि बहार हर सू नज़र आती है


पगडंडियों पर चलने में एक अलग अनुभूति होती है। 
पगडंडियाँ अपनी राह में 
आने वाले पेड़ पौधे ,घास फूस, झाड़ी ,
नदी नाले ,जंगल  इत्यादि को कभी रौंदती नही 
बल्कि उन सबके अस्तित्व को 
बचाते हुए आगे बढ़ती जाती है। 
पगडंडियों पर कभी भीड़ नही होती , 
कभी रास्ते रुकते या बन्द नही होते।


न आदि है, ना ही अंत है!
उन चेतनाओं में, सुसुप्त प्राण है,
उनकी कल्पनाओं में, इक अनुध्यान है,
उन वेदनाओं में, इक अजान है,
बची है, श्याम-श्वेत सी,
इक तलाश!


भले घर की लड़कियाँ
ये सब काम नहीं करती
ज़माना सही नहीं है
जब अभिभावकों के
हद के बाहर का हो
पलड़े का वजन


कहो न!!
क्या विशेष हो तुम?
जिसकी गुमनाम  मौत पर
क्रांति गीत गाया जाए?
शोक मनाया जाए?
महामारी के दौर की
एक चर्चित भीड़!
सबसे बड़ी ख़बर,
जिनके अंतहीन दुःख 
अब रोमांचक कहानियाँ हैं..?



जागने पर भी नहीं आंख से गिरतीं किर्चें
इस तरह ख़्वाबों से आंखें नहीं फोड़ा करते

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिए दिल नहीं थोड़ा करते
...
बस
कल शायद फिर
सादर