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Thursday, April 9, 2020

320 ..ये तो लम्बी सी जीवन भरती साँसें है


सादर अभिवादन

साल 2020 किस घड़ी में शुरु हुआ
कोई पंडित-ज्ञानी बताए
नहीं बता सकते तो
कोई बात नहीं
चौथा महीना लिकल गया
बाकी आठ भी निकल ही जाएंगे
जैसे - तैसे
चलें चलते हैं..
आज अंतिम दो रचनाएँ बंद हो गए ब्लॉग से


सपने सजे तुषार-कणों से 
गूँथ जीवन के मुक्ताहार ।
कुसुम खिला है मन-उपवन में  
मधुकर गुंजन मधुर मल्हार।
यादें हुई तिरोहित सहचर 
अंतर कंपित सोहे स्पंदन ।।


दिशा दीप्त हो उठी प्राप्तकर
पुण्य--प्रकाश तुम्हारा,
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों
में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया,
वह फूल खिलायेगी ही,
अम्बर पर घन बन छायेगा
ही उच्छवास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है।
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।


पिछले कई दिनों से 
मेरे साथ है ये आवाज
लेकिन ये मेरी साँसें तो नहीं है
ये तो लम्बी सी
जीवन भरती साँसें है
ये सुकून वाली साँसें है
ये खुशी वाली साँसें है
जब कही किसी पेड़ पर
कोई पत्ता हिलता है तो
ये साँस अंदर जाती है


दरिया कूज़े में कैसे समाया होगा
सहरा की प्यासी रेत से बनाया होगा

बहुत एहतियात से उठाना तुम इसे
ग़र्दिश ए मस्ती ने इसे घुमाया होगा

तूफ़ान के बाद भी निशाँ हैं बाक़ी
जरुर मौजों का क़र्ज़ बकाया होगा

कितनी बड़ी दिलेर ....रंजना डीन
घर के आँगन के पीछे
एक बड़ा सा पेड़
चाँद झांकता पीछे से
जैसे उजली भेड़

 फर्श पे बिखरे पानी पर
कभी उतर आता
कभी बादलों से करता
प्यार भरी मुठभेड़
..बस
शायद कल फिर..
सादर