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Sunday, March 15, 2020

295..लगी आग, लगाई आग, कुछ राख, कुछ बकवास और कुछ चिट्ठाकारी

रविवार..
आज्ञा न टाल सका है कोई
और न भविष्य में टाल सकेगा

फरमान, फरमान ही होता है

चलिए रचनाओं की ओर ...


ऐसे लोग मजदूर कहलाते हैं .....नीतिश तिवारी

भविष्य के लिए नहीं जीते,
वर्तमान को सुंदर बनाते हैं,
सुबह से शाम मेहनत करते,
ऐसे लोग मजदूर कहलाते हैं।


मरीजों की दवा कौन करे ..दिनेश द्विवेदी

कोरोना वायरस से मुकाबले के लिए हम क्या कर रहे हैं? लगभग कुछ नहीं। हम अपने घटिया धर्मों, परंपराओँ और अन्धविश्वासों के हथियारों से उसे हराने की बात कर रहे हैं, जिनसे इंसान के अलावा कोई परास्त नहीं होता। गोबर और गौमूत्र थियरियाँ फिर से चल पड़ी हैं। यही नहीं उससे नाम से कमाई भी की जा रही है। कुछ सौ रुपयों में गौमूत्र पेय और गोबर स्नान उपलब्ध करा दिए गए हैं। गाय को उन्होंने कब से माँ घोषित कर रखा है। जो खुद की माँ को न तो कभी समझ सके हैं और न कभी समझेंगे। यदि वे उसे समझते तो शायद गाय, गौमूत्र और गोबर के फेर में न पड़ते। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि ज्यादातर वायरल बीमारियाँ पालतू जानवरों से ही मनुष्यों में फैली हैं। लेकिन हम उन्ही पालतू जानवरों के मल-मूत्र से उसकी चिकित्सा करने में जुटे पड़े हैं।


मन चाहे ...पुरुषोत्तम सिन्हा

मन चाहे, जी लूँ दोबारा!
जीत लूँ सब, जो जीवन से हारा!

संदर्भ नए, फिर लिख डालूँ,
नजर, विकल्पों पर फिर से डालूँ,
कारण, सारे गिन डालूँ,
हारा भी, तो मैं,
क्यूँ हारा?

शहर में अब शांति-शांति है ..संतोष त्रिवेदी

ऐसी ही निपट शांति के बीच कल एक नवोदित दंगाई से भेंट हो गई।हमारे हाथ में लाल गुलाल था और उसके हाथ में क्रांतिकारी गुलेल।सात्विक माहौल देखते हुए मैंने गुलाल भरा हाथ आगे बढ़ाया तो उसने झट से अपनी गुलेल आगे कर दी।हमने कहा, ‘हम तो बस आपको  गुलाल लगाना चाहते हैं।शांति के पुजारी ठहरे।अभी-अभी शांति-मार्च से लौटे हैं।सोचा,आपसे भाईचारे की बोहनी कर लूँ।होली खेलने का मौसम भी है।आपको कोई हर्ज तो नहीं ?’ गुलेल सीधी करते हुए वे बोले, ‘होली तो हम भी खेलते हैं।अभी खेली भी है।पर जो ‘एडवेंचर’ गुलेल से खेलने में आता है,वह गुलाल में कहाँ जी !आओ हमारे खंडहर में,वहीं खेलते हैं।’




उलूक के आज के अंक में


इस से बड़ा
आठवाँ आश्चर्य
बताइये कोई

‘उलूक’
तेरी तरह का
कोई
पढ़ेगा जरूर

अच्छा होता है
लिख कर
कुछ बकवास

फिर
सो जाना
सूखे पेड़ की ठूँठ पर

आँख
खोल कर
हमेशा की तरह 
...
बस अब और नहीं
कल की कल देखेंगे
आशावादी हैं न हम
सादर