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Wednesday, March 11, 2020

291..एक हम लोग बुद्धू थे, कुछ अता था न पता!

होली के बाद का
पहला दिन
अलसाया पड़ा है देश
समाचार पत्र आज नहीं है
फेसबुक और व्हाट्सएप्प
सारी पुरानी खबरें छाप रहा है
और हम भी समय बिता रहे हैं
गहमा-गहमी तो है
भाई दूज हैं आज

चलिए चलते हैं रचनाओँ की ओर ....

वर्षो बाद बरसात की रात
अजब इत्तेफाक की बात
रात के पहर दस्तक
दरवाज़े पर था कोई रहवर
जैफ ने पनाह मांगी
मेरे घर के चरागों में
रौशनी बहुत कम थी
परफ्यूम की खुशबु जानी पहचानी थी


महीना पच्चीस दिन दूध-घी उड़ामें और
जाय कें अखाडें दण्ड-बैठक लगामें हैं॥

मूछ'न पे ताव दै कें जंघ'न पे ताल दै कें
नुक्कड़-अथाँइ'न पे गाल हू बजामें हैं|


अंग-अंग, घुल चुके अनेक रंग,
लग रहे हैं, एक से,
क्या पीत रंग, क्या लाल रंग?
गौर वर्ण या श्याम वर्ण!
रंग चुके एक से,
हल हुए हैं आज, कई सवाल!


भला हो मीडिया का! बच्चे सयाने कर दिये हैं इसने! 
वे जानने लगे हैं, "मिड लाइफ क्राइसेज़,  मैरिड लाइफ, 
क्राईसेज़ और डिफ्रेंट सेक्सुअल प्लेज़र के बारे मे। 
उन्हें पता है  अनचाहे गर्भ से कैसे छुटकारा पाते हैं! 
और क्या करने से लडकी प्रेग्नेंट नही होती!! 
(एक हम लोग बुद्धू थे, कुछ अता था न पता!)


कोई नोटिफिकेशन फिर थमा देता है उदासी
कि दंगों में मरने वालों की संख्या बढ़कर....हो गई है
राष्ट्रवाद फिर से मनुष्यता से टकराने को
बाहें कसने लगा है फेसबुक पर...

मन की वीणा में .....मन की गति कोई न जाने

कभी अर्श चढ़ कभी फर्श पर
उड़ता फिरता मारा मारा ।
मीश्री सा मधुर और मीठा
कभी सिंधु सा खारा खारा।
कोई इसको समझ न पाया
समझा कोई हर कण हर कण।।

......
आज बस
कल फिर
सादर