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Monday, March 2, 2020

282..बिन तेरे हम रातों को सोये कैसे

स्नेहिल अभिवादन
माह का दूसरा दिवस
सच में प्यारा है
रंगों का दुलारा है
...
आज दिन 11 बजे तक प्रकाशित ब्लॉगों की रचनाएँ..

पहली बार श्री मानव मेहता
सहरा कभी जंगल होये तो होये कैसे
दिल-ए-बंजर पर मोहब्बत का फूल बोये कैसे…

चले आओ कि अब तो शाम ढलने लगी
बिन तेरे हम रातों को सोये कैसे...


खून-खून, है ये फागुन,
धुआँ-धुआँ, उम्मीदें,
बिखरे, अरमानों के चिथरे,
चोट लगे हैं गहरे,
हर शै, इक बू है साजिश की,
हर बस्ती, है मरघट!


साथ ही  समाचार पत्रों में आगे यह भी लिखा हुआ था कि सेठजी का नागरिक अभिनंदन  ' भ्रष्टाचार मिटाओ ' संस्था के बैनर तले किया जाएगा.. जिस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि स्वयं नये साहब ही होंगे..और दोखीराम जी नये साल में अपनी फैक्ट्री की ओर से किये जाने वाले धर्मार्थ कार्यों जैसे निर्धन कन्याओं का विवाह , गरीब मेधावी छात्रों को आर्थिक मदद और मुहल्ले में स्थित मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए मोटी रक़म देने की घोषणा इसी मंच से करेंगे..।


झूमता गेंदा
जीवन उपवन
यादें है महकी...
..........
प्यार तुम्हारा
बाबुल तुम बिन
कैसे पाऊँ।




आज अब बस
कल फिर
सादर

Sunday, March 1, 2020

282 ...जीवन बढ़ता जाता कन्टकाकीर्ण मार्ग पर

सादर अभिवादन
आखिर चली ही गई फरवरी
इस बार एक दिन ज्यादा रुकी
जाना तो था ही
...
चलिए रचनाओँ की ओर...

सुलगती रही, इन्हीं आबादियों में, 
बहते रहे, तपते रेत के धारे...

सूखी हलक़, रूखी सी सड़क,
चिल-चिलाती धूप, रूखा सा फलक,
सूनी राह, उड़ते धूल के अंगारे,
वीरान, वादियों के किनारे,
दिन कई गुजारे!


वैमनस्य का कारण ....
उथल-पुथल क्यो मन के अंदर,
कोई न कारण जान सके।
उगता हुआ सूरज भी मन में,
कोई उजाला भर न सके।
मुश्किल से मत डरकर भागो,
डर से मिले न कोई छोर।
उठकर अपनी आँखें खोलो,
देखो आई सुंदर भोर।।


संभाल के रख लुंगी उस अंकुरित आस को 
उम्मीदों की पोटली के इक कोने में बाँध दूंगी
जब भी भूखो मरने लगेगी कोई उम्मीद फिर से
तोड़ के इक टुकड़ा उस चाँद के अंकुर का
निवाला बना मैं निगल जाउंगी .......
शायद ऐसे भूखी उम्मीदों का पेट भर पाउंगी


टेसू के फूल
फागुनी बयार में
लगे आग से!
.....
जीवन- गाड़ी
चलती, न थकती
अडिग मन !


जीवन बढ़ता जाता 
कन्टकाकीर्ण मार्ग पर
अकेले चलने में
दुःख न होता  फिर भी |
क्यूँ कि आदत सी
हो गई  अब तो
जिन्दगी में  अकेले रहने  की  |