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Saturday, February 15, 2020

267..जिस क्षण मैने तुम्हे छुआ था धूप बन ओ! ओस के कण

सादर अभिवादन..
बकौल विभा दीदी
आज खाली जेब डे है
खैर...हने दीजिए हमें क्या..
चलिए रचनाओँ की ओर..

बेवजह......
बरसती बूँदो का
ढूँढ रही थी मै सिरा;
अचानक
तेरा ख्याल आ गिरा ,
छाया घन सा घनघोर
जिसका कोई
ओर न छोर,
हृदयांगन
भीग गया जगह जगह,
और वही
बेवजह।।


खिलखिलाहट से परे
रुआंसे व्यक्ति की शायद बन जाती है पहचान,
उदासियों में जब ओस की बूंदों से
छलक जाते हों आंसू
तो एक ऊँगली पर लेकर उनको
ये कहना, कितना उन्मत लगता है ना
कि इस बूंद की कीमत तुम क्या जानो, लड़की!


मेघाच्छादन
बिखरता सैलाब~
गीला क्षितिज!

डूबती नाव~
उफनाती सी धार
तैरते लोग!


प्रेम प्रतीक है माना जाता
मन को मेरे अति हर्षाता
काँटों में भी रहे शादाब
हैं सखी साजन ?......
..................न री गुलाब ।


hindi love poem
मैं लिख दूँगा
अपने को सम्पूर्ण
संसाधनों से परिपूर्ण
व्यक्तित्व होने के
बावजूद तुमसे कभी
ना मिल पाने वाली
प्रेम करने को चाह।
....
अब बस
कल फिर
सादर