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Wednesday, January 29, 2020

251...समझना जरूरी नहीं, होता है हमेशा पागलपन

वसंत पंचमी की पूर्व संध्या पर
हार्दिक अभिनन्दन
आज ही मधुरिमा मे एक
वसंत गीत पढ़ी
आप भी पढ़िए

वसंत गीत.. सुमन खरे
Image may contain: flower, nature and outdoor
आयो सखि मधु ऋतुराज वसंत
अविजित शिशिर का हुआ अंत..
धरती ने ओढ़ी पीत चुनर
दिनकर के तेवर तीक्ष्ण प्रखर
फूले महुआ चहुं दिगदिगन्त
आयो सखि..
मीठी आंधी फगुनी बयार
वामा तकती नित घर का द्वार
लौटा अब तक न मेरा कंत
आयो सखि..
फागुन पहुना ने दी दस्तक
पीछा करता पहुंचा घर तक
गये राह भटक मनवां के संत
आयो सखि..
....
अब चलिए रचनाओं का ओर...
मैं भी जी रही थी 
अपने हालात को
अपनी नियति मान
समझौता करते हुए 
हर मौसम एक सी 
रहते रहते
खुद को पत्थर ही 
समझने लगी थी


कोई हर्फ, नहीं, 
गूंजती हुई, इक लम्बी सी चुप्पी,
कँपकपाते से अधर,
रूँधे हुए स्वर,
गहराता, इक सूनापन,
सांझ मद्धम,
डूबता सूरज,
दूर होती, परछाईं,
लौटते पंछी,
खुद को, खोता हुआ मैं,


जिसके हो गए उसी में खो गए
रंग में उसी के रंगते गए
क्या यह प्यार नहीं ?
यह है बहुआयामी
और अनंत  सीमा जिसकी
यह तो है सुगन्धित बयार सा
जिसे बांधना सरल नहीं |


शीतक्षत उँगलियों से
कब तक लिखे जायेंगे
अंधेरों के गीत

रात लौट आयी है
इतना ही है मेरी

उम्र क़ैद का दायरा



किसी
शब्दकोष
में
कहाँ
पाये जाते हैं

‘उलूक’

पागल
पागल होते हैं

पागल
कैसे
बनायेंगे
किसी को

समझना
जरूरी नहीं है
हमेशा
पागलपन।

आज बस
वसंतोत्सव की अग्रिम शुभकामनाएँ
सादर