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Saturday, November 23, 2019

184.."मतलब? यह असाधारण मौत कैसी होती है भला?"

शुरुआत एक अजीबो गरीब विज्ञापन से

अजब गजब विज्ञापन ...विकास नैनवाल 'अंजान' 

राह चलते चलते आपको अचानक से कभी कभार ऐसा विज्ञापन दिख जाता है जो बरबस ही आपकी नज़र अपनी तरफ आकर्षित कर देता है। ऐसा कुछ मेरे साथ कुछ दिन पहले हुआ। मैं बाइक के पीछे बैठा अपने गन्तव्य की तरफ बढ़ रहा था कि एक ऑटोरिक्शा मेरे बगल से गुजरने लगा। सामान्य सा दिखने वाला यह ऑटोरिक्शा उधर मौजूद कई ऑटोरिक्शों की तरह था। अगर आप महानगर में रहते हैं तो इतना तो जानते होंगे कि ऑटोरिक्शा के पीछे का हिस्सा अक्सर विज्ञापनों के लिए इस्तेमाल होता है

अब सादर अभिवादन स्वीकारें..
चलिए आगे बढ़ते हैं.....


यो कहानी भी रोचक है..दो मरने वाले को एक नवजात बच्ची जीवनदान देती है.. पढ़िए इस तरह....
कुछ मीटर पर...ज़िंदगी! ...मोहित शर्मा

तृप्ति और कुंदन वापस उस जीवन, उन संघर्षों में एक नई उम्मीद के साथ वापस लौटे और अपने सकारात्मक नज़रिए से जीवन को बेहतर बनाने लगे। अब जब भी वे परेशान होते तो अपनी बेटी का चेहरा देखकर सब भूल जाते। ऐसा नहीं था कि उन्हें किसी जादू से ज़िंदगी में खुशियों की चाभी मिल गई थी, बस अब वे ज़िंदगी से बचते नहीं थे बल्कि उससे लड़ते थे।

उस दिन कुंदन और तृप्ति ने उस बच्ची को नहीं बचाया था...उस बच्ची ने बस वहाँ मौजूद होकर उन दोनों की जान बचाई थी।

बीता कल यादों में सिमटा ...आशा सक्सेना

बीता कल यादों में सिमटा
आनेवाले कल का कोई पता नहीं
तब किया वर्तमान में जीने का विचार
हर पल है वेश कीमती |
वर्तमान भी बहुत बड़ा है
जाने कब क्या हो जाए


इश्‍तेहार ....संजय भास्कर

इश्‍तेहार
चाहे किसी कंपनी का हो या
किसी स्कूल,दुकान का
उसे पढ़ना चाहिए
क्योंकि उसे पढ़ने में कोई ड़र नहीं
समय ही ऐसा हो गया है
सब काम ही इश्‍तेहारो से होते है

विचार आते हैं ...गजानन माधव मुक्तिबोध

विचार आते हैं
लिखते समय नहीं
बोझ ढोते वक़्त पीठ पर
सिर पर उठाते समय भार
परिश्रम करते समय
चांद उगता है व
पानी में झलमलाने लगता है
हृदय के पानी में 

आशा है हम कल फिर मिलेंगे
सादर..