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Sunday, November 17, 2019

178..लदी हुई हैं शाखें कोमल उजले सफेद फूलों से

सादर अभिवादन
आज की संक्षिप्त प्रस्तुति
रविवार की वजह से
पारिवारिक हलचल है
देखिए आज की रचनाएँ...

मौत भले ही एक रहस्य हो 
इस नश्वर शरीर के  सुक्ष्म तत्वो में    
विलीन हो जाने का 
प्रकाश पुंज हो जाने का परंतु, 
सिर्फ वहां ध्यान केंद्रित करो 


मैं भी अधूरा जीने लगा हूँ,
तेरे ही खयालों में,
बढ़ने लगी है उलझन मेरी,
तेरे ही सवालों में।

तुझे पाने की चाहत मेरी,
अपना बनाने की आदत मेरी,
बड़ी मुश्किल है कैसे बताएँ,
तू ही है अब राहत मेरी।


स्नेहिल अंगुलियों की
छुवन मांगता है मन..
बन्द दृगों की ओट में
नींद नहीं..जलन भरी है


चुप हैं ये दिशाए, कहीं बज रहे हैं साज! 
धड़कनों नें यूँ, बदले हैं अंदाज! 
ओढ़े खमोशियाँ, ये कौन गुनगुना रहा है? 
हँस रही ये वादियाँ, ये कौन मुस्कुरा रहा है? 
डोलती हैं पत्तियाँ, ये कौन झूला रहा है? 



कर रही है खुशगवार 
रातरानी की यह मादक महक 
मुझको... 
लदी हुई हैं शाखें 
कोमल उजले सफेद फूलों से, 
खिल उठते हैं हममिजाज़ मौसम में 
गुंचे गुलों के 

बस..
कल तक के लिए आज्ञा दें
सादर