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Thursday, November 7, 2019

168..तुम्हारे चेहरे की मासूम परछाई

सादर नमस्कार..
आज हम आ गए..
हमारी सोच कुछ अलग नहीं है..
पर सोच से जरूर ज़रा अलग ही है..

सर्व प्रथम शुभकामनाएँ पुरुषोत्तम जी को
उनकी 1101 वीं रचना के लिए...पढ़िए


स्पंदन (1101 वीं रचना)

अन्तर्मन हुई थी, हलकी सी चुभन! 
कटते भी कैसे, विछोह के हजार क्षण?
हर क्षण, मन की पर्वतों का स्खलन! 
सोच-कर ही, कंपित सा था मन! 

घर ढूंढ़ता है कोई

उफ ये दौड़ , ये भागमभाग, 
चुपचाप सा बहता है कोई। 

बदहवास ज़िंदगी का सबब है क्या, 
अपना ही पता यहां पूछता है कोई।

तुम्हारी आँखें ..

तुम्हारे चेहरे की
मासूम परछाई
मुझमें धड़कती है प्रतिक्षण
टपकती है सूखे मन पर
बूँद-बूँद समाती
एकटुक निहारती
तुम्हारी आँखें


"क्षणिकाएं" ....

नेह के धागों से 
बुनी थी वह  कमीज
वक्त के साथ...
नेह के तन्तु
सूखते गए और….
कमीज की सींवन दुर्बल

खोखला हैं लिव इन रिलेशनशिप का रिश्ता
खोखला हैं लिव इन रिलेशनशिप का रिश्ता
जब बालिग लड़का और लड़की अपनी मर्ज़ी से विवाह के बंधन में बंधे बिना घर की एक ही छत के नीचे पति-पत्नी की तरह रहते हैं तो उस संबंध को लिव इन रिलेशन कहते हैं। लिव इन भावनात्मक बंधन के आधार पर साथ रहने का व्यक्तिगत एवं आर्थिक प्रबंध मात्र हैं। इस में हमेशा के लिए साथ देने का कोई वादा नहीं होता।

अपनी 'पोनी-टेल' में ...

बस .. एक कॉल या मिसकॉल भर
या फिर व्हाट्सएप्प ही
कर देना ना .. प्लीज !! ..
आने के कुछ घंटे पहले
ताकि सज-सवंर लुंगा
'फुसफुसा' लुंगा थोड़े डिओ भी
अपने झुर्रियाए बदन पर
और तुम भी तो आओगी ही ना ..
हर बार की तरह मेरी पसंद की
अपनी 'पोनी-टेल' में ... .. आँ ..!?
....
आज कसर निकल गई
बस भी कर...
दिग्विजय