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Saturday, October 19, 2019

149..किसलिये टेढ़ा कर के ही बेचने की ठानी है

हमने भी ठान लिया है
पाँच लिंकों का आनन्द के किसी भी चर्चाकार को
यहाँ पर प्रस्तुति देने को बाध्य नहीं करेंगे
वे और हम, किसी से नहीं हैं कम
सादर अभिवादन...
आज प्रकाशित रचनाओं से कुछ नायाब मोती...

तेरा साथ हो मेरा हाथ हो
संग तेरे चाहत की बरसात हो
तुझे  सोचूँ  तुझको  ही  देखू
मिलने की तुझसे इक आस हो
रंग बिरँगी दुनिया हो अपनी
सिर्फ मीठा मीठा सा अहसास हो


मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,
कटेगे तभी यह अँधेरे घिरे अब
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए...।


न होता, ये असीम फैलाव, 
न जन्म लेती तृष्णा, 
कुछ कम जाते, 
भले ही, कामना रुपी ये तारे, 
जो होते, आकाश के दो किनारे! 
न बढ़ती पिपासा, 
न होती, किसी भरोसे की आशा, 


चाँद-चाँदनी की अनुपस्थिति में, 
तारे खिलखिला रहे हैं। 
कभी कभी अमावस भी होनी चाहिये। 


बड़ा देश 
अनगिनत लोग

समस्याएं
आनी जानी हैं 

आदत 
लक्ष्मी की 
ना टिकने की 

पुरानी है 

सरकार 
बदल देने से 

थोड़े
बदल जानी हैं 
...
आज बस यहीं तक
सादर