सादर अभिवादन..
शरद पूर्णिमा कल है...
पर आज महानायक का जन्मदिन है
आज वे 77 वाँ जन्मदिन मना रहे हैं
पहले उनकी फिल्म का एक गीत सुनते हैं
शरद पूर्णिमा कल है...
पर आज महानायक का जन्मदिन है
आज वे 77 वाँ जन्मदिन मना रहे हैं
पहले उनकी फिल्म का एक गीत सुनते हैं
अमिताभ बच्चन..जी हाँ ...
वही जो कुली फिल्म मे चोटिल हुए थे
सादर अभिनन्दन व शुभकामनाएँ
चलें रचनाओँ ओर..
एक कवि, जब मर जाता है ....
चरणबद्ध तरीके से
बंद करता है एक-एक कपाट
प्रत्येक खिड़कियाँ, हरेक रोशनदान को;
जिनसे, बेबस कविताओं की
नन्हीं-नन्हीं कोंपलें झाँक रही होती हैं,
उसकी हर एक साँस को माप रही होती हैं।
दर्द का रिश्ता .....
निर्मलता की उपमा से,
क्यों प्रेम मलीन करूँ अपना,
तुम जानो अपनी सीमाएँ,
मैं जानूँ, तुम हो सपना !
साथ छोड़कर मत जाना,
भटकाव सँभलता है तुमसे !
बरसों से भूला बिसरा,
इक चेहरा मिलता है तुमसे !
मुर्दो ने पूछा ...
मुर्दो ने पूछा ,
आज यहाँ क्यों,
आये हो ,
क्या अपने घर ,
का रास्ता भूल ,
आये हो ,
मैंने कहा सुना था ,
भूत लोगो को ,
डराते है ,
कभी सपने में ,
को कभी सामने ,
आ जाते है |
वही शख्स पुराना लगता है ....

कोई लकल्लुफ नही रहा गुफ्तगू मे
ताल्लुकात बहुत पुराना लगता है
हमकलाम हुए है हम कई दफा सुरज से
हमारा महताब पर आना जाना लगता है
भेद का पर्दा ...

कभी होता है जरुरी हटना भी
पर पर्दे का कई बार
हो जो अगर पड़ा अक्ल पर
और समय से उठना भी
प्रदर्शन शुरु होने से पहले
किसी भी मंच पर
और हाँ !!! ...
हटा रहे मन से भी
हर एक भेद का पर्दा
आज के लिए इतना ही..
सादर
वही जो कुली फिल्म मे चोटिल हुए थे
सादर अभिनन्दन व शुभकामनाएँ
चलें रचनाओँ ओर..
एक कवि, जब मर जाता है ....
चरणबद्ध तरीके से
बंद करता है एक-एक कपाट
प्रत्येक खिड़कियाँ, हरेक रोशनदान को;
जिनसे, बेबस कविताओं की
नन्हीं-नन्हीं कोंपलें झाँक रही होती हैं,
उसकी हर एक साँस को माप रही होती हैं।
दर्द का रिश्ता .....
निर्मलता की उपमा से,
क्यों प्रेम मलीन करूँ अपना,
तुम जानो अपनी सीमाएँ,
मैं जानूँ, तुम हो सपना !
साथ छोड़कर मत जाना,
भटकाव सँभलता है तुमसे !
बरसों से भूला बिसरा,
इक चेहरा मिलता है तुमसे !
मुर्दो ने पूछा ...
मुर्दो ने पूछा ,
आज यहाँ क्यों,
आये हो ,
क्या अपने घर ,
का रास्ता भूल ,
आये हो ,
मैंने कहा सुना था ,
भूत लोगो को ,
डराते है ,
कभी सपने में ,
को कभी सामने ,
आ जाते है |
वही शख्स पुराना लगता है ....

कोई लकल्लुफ नही रहा गुफ्तगू मे
ताल्लुकात बहुत पुराना लगता है
हमकलाम हुए है हम कई दफा सुरज से
हमारा महताब पर आना जाना लगता है
भेद का पर्दा ...

कभी होता है जरुरी हटना भी
पर पर्दे का कई बार
हो जो अगर पड़ा अक्ल पर
और समय से उठना भी
प्रदर्शन शुरु होने से पहले
किसी भी मंच पर
और हाँ !!! ...
हटा रहे मन से भी
हर एक भेद का पर्दा
आज के लिए इतना ही..
सादर


