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Saturday, September 28, 2019

128..यादें अतीत सी ,कसकती ही रहीं

कल का अंक 
वास्तव में सदा दीदी को
गुजरा पल याद दिला दिया होगा
सोच रही होंगी 

क्यों रेगुलर ब्लॉगिग से हटी..
बहरहाल आज की रचनाओं पर एक नज़र...

जब जाना ही है तो
विदा न लो , सीधे जाओ
हम रोये या गाये
पत्थर- सा हो जाओ
चुप रहो , कुछ नहीं सुनना
लो , प्राण खींच ले जाओ
अब हमारा ही है भाग्य निगोड़ा
तो जाओ , तुम पर छोड़ा ......




एक पोशाक
दुखों के छिद्र से भरी हुई
अवसाद से छिद्र बढ़ते हुए
पैबंद लगाने बैठे छिद्रों
पर सुखों का ,
विश्वास के धागों से
सपने टांके,
लगन की सुनहरी जरी से
पोशाक बड़ी खूबसूरत नजर आई ।



छोटे छोटे पल ,पलक से झरते रहे
छोटी छोटी बातें ,बड़ी बनती गयीं

निगाहें व्यतीत सी ,छलकती रहीं
यादें अतीत सी ,कसकती ही रहीं


वक़्त बे वक़्त हर बात पें निकल आये आँसू,
तेरे जाने के बाद कितना काम आए आसूँ

एक हम थे जो ख़ामोश ज़हर पी  गयें,
तुमने जा-जा के लोगो को दिखायें आँसू,


याद करने का सिला मैं इस तरह पाने लगा
मुझको आईना तेरा चेहरा ही दिखलाने लगा

दिल की बंजर सी ज़मी पर जब तेरी दृष्टि पड़ी
ज़र्रा ज़र्रा खिल के इसका नाचने गाने लगा

ज़िस्म के ही राजपथ पर मैं जिसे ढूँढा सदा
दिलकी पगडंडी में पे वोही सुख नज़र आने लगा



गुमनाम हुए वक़्त गुजर गया,
चलो,
खुद से खुदको मिलाकर आते है।

बहुत बाँट लिया दर्द को अपने,
चलो,
अब खुद में सिमट जाते है।
....
आज हम अतिक्रमण क बैठे
चलो
कल के अंक में एक कम दोंगे
आज्ञा दें
सादर