Showing posts with label 125. Show all posts
Showing posts with label 125. Show all posts

Wednesday, September 25, 2019

125... अपनी पलकों के भीतर ध्यानस्थ,चढ़ाती रहूँ अर्ध्य

स्नेहिल अभिवादन
अझेल नहीं न हैं हम
कहीं तो पाप अधिक हुआ है
तभी तो शेषनाग नें 
मस्तक अपना हिलाया
धरती फट गई कहीं
समा गई इमारतें
नहीं समाया तो गुरूर
पापियों का..
अब बस आगे नहीं लिख सकती
आइए रचनाएँ देखें...

सोचती हू्ँ...
अच्छा हो कि
मैं अपनी स्नेहसिक्त
अनछुई कल्पनाओं को
जीती रहूँ
अपनी पलकों के भीतर
ध्यानस्थ,चढ़ाती रहूँ अर्ध्य 
मौन समाधिस्थ
आजीवन।


तुम तेज़ हो
तुम ओज हो
तुम रोशनी मशाल की
देखकर तुम्हें, ज़िन्दगी
जी उठी शमशान की
स्वप्न एक कच्ची उमर का


पलट के आज फिर आ गई २५ सितम्बर ... वैस तो तू आस-पास ही होती है पर फिर भी आज के दिन तू विशेष आती है ... माँ जो है मेरी ... पिछले सात सालों में, मैं जरूर कुछ बूढा हुआ पर तू वैसे ही है जैसी छोड़ के गई थी ... कुछ लिखना तो बस बहाना है मिल बैठ के तेरी बातें करने का ... तेरी बातों को याद करने का ...


चपरासी के दस पदों के लिए लगभग सात सौ आवेदकों का इंटरव्यू चल रहा था. कई एम्. .ए ,बी. ए. एम्.कॉम. एम् एस-सी. इंजीनियरिंग और पॉलिटेक्निक डिग्री, डिप्लोमा धारक भी कतार में लगे हुए थे ,लेकिन उन्होंने अपनी उच्च शैक्षणिक योग्यता को छुपाकर न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता (कक्षा पांचवीं )के आधार पर आवेदन किया था और उस आधार पर इंटरव्यू में बुला लिए गए थे . चयन समिति के हम चार सदस्य जब प्रत्येक आवेदक की बोल चाल और उनके पहनावे के आधार पर जैसे-जैसे उनकी शिक्षा के बारे में पूछताछ करते थे ,यह खुलासा होता जाता था .


पुकार अब
हृदय तक नहीं जाती
नहीं जलती कोई आग
नहीं उठती कोई लहर
पुकार में नहीं दम या
हृदय में भाव हुए कम
या हो गए हम निष्प्राण

अब बस
आप लोग पढ़ने नहीं आते हैं
जाइए कल हम नहीं आएँगे
सादर
यशोदा