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Tuesday, September 24, 2019

124..चलो बस यूँ ही चाँद पर रोटी तोड़ने

सादर अभिवादन
हिन्दी महीने की 10 तारीख
यानी पितृ-पक्ष के पाँच दिन और
क्या पितर आते हैं भोजन करने
पौराणिक मान्यताएं हैं
निभा लेते हैं कुछ साल और
फिर नई पीढ़ी क्या करेगी
ये ढकोसले..
बहरहाल चलें रचनाओं की ओर...

है
जंग
जिंदगी
दुखदायी
स्वार्थों से बंधी
विवादों में फंसी
उलझनों से घिरी।


दिल कहता है 
तुम लिखो 
फूल, पत्तों, परिंदों, प्रेम की बात 
दिमाग़ कहता है 
लिखो तकलीफ़ 
लिखो भीड़ में घिरने की बात 
लिखो 'एनआरसी' 
के पन्नों में छिपे नश्तरों को

एक सदी से प्रतीक्षा कर रही हूँ !  
कुछ उधड़ी परतें सिल चुकी हूँ! 
कुछ सिलनी बाकी है!  
कई- कई बार सिल चुकी हूँ पहले भी ! 
फिर भी दोबारा सिलना पड़ता है ! 
जहाँ से पहले शुरू किया था, 


मैं और वो - विकास नैनवाल
मैं देखता हूँ, 
ठहरता हूँ 
सोचता हूँ 
फिर चलने लगता हूँ, 
सोचकर कि मुझे क्या, 

दर्पण, तू लोगों को
आईना दिखाता है
बड़ा अभिमान है  तुम्हें
अपने  पर ,कि
तू  सच दिखाता है।
आज तुम्हे  दर्पण,
दर्पण दिखाते हैं!



वो 
कहते हैं

तुम

सो रहे हो

हमें

वो 
सोये
हुऐ से
नजर 
आते हैं
....
आते हैं कल फिर कल
यशोदा