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Saturday, September 21, 2019

121....मैं चाहूँ दिल से हँसना

शाम का
स्नेहिल नमस्कार
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बिना जाने-सोचे उंगलियाँ उठा देते हैं लोग
बातों से बात की चिंगारियाँ उड़ा देते हैं लोग
अख़बार कोई पढ़ता नहीं चाय में डालकर
किसी के दर्द को सुर्खियाँ बना देते हैं लोग
कुछ रोज़ गर न मिलिए ज़माने से रु-ब-रु
ज़ेहन से नाम की तख़्तियाँ हटा देते हैं लोग
#श्वेता
★★★★
चलिए अब आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-
रुह से सज़दा

रात भर रोई नरगिस सिसक कर बेनूरी पर अपने
निकल के ऐ आफ़ताब ना अश्कों में ख़लल डालो।

डूबती कश्तियां कैसे, साहिल पे आ ठहरी धीरे से
भूल भी जाओ ये सब ना तूफ़ानों में ख़लल डालो।
★★★★★★★


मैं चाहूं दिल से हंसना,
पर जख्म न दिल के छिपा पाऊं।
मैं चाहूं सबको खुश रखना,
पर खुद को खुश न रख पाऊं।
न जाने कैसी प्यास है जीवन में,
कोशिश करके भी न बुझा पाऊं।
इस चक्रव्यूह से जीवन में,
मैं उलझी और उलझती ही गई।



जीवन-दर्शन


गुंजन कर भँवरा चला , देखे पुष्प पराग।

बिन स्वार्थ के कब करे,कौन यहाँ अनुराग ।।

सेज  कभी अर्थी सजे,कभी प्रभू का द्वार ।
लघु जीवन है पुष्प का ,सुरभित सब संसार।।



★★★★★

हर आहट लगे जैसे तुम गये

एक भौंरा गली से गुजरकर मेरे
रूप की माधुरी ही चुरा ले गया
चूस मकरंद वहशी गुलों के सभी
सुर्ख अधरों की लाली उड़ा ले गया ।
हर बटोरी से तेरा पता पूछती
हार तेरे लिए पुष्प के गूंथती
दृग को प्रतिपल प्रतिक्षा रही देवता
दौड़कर द्वार पर हर घड़ी देखती ।
★★★★★

ऊँचे लोगों की बात चली तो बाबाओं की याद हो आई। आजकल बाबाओं की चर्चा फिर सुर्खियों में है। ये बाबा बड़े कृपालू होते हैं। अपनी ख्याति बनाए रखने के लिए समय-समय पर अपना डंडा/झण्डा गाड़ कर, फहरा ही देते हैं। बाबा के पकड़े जाने की खबर सुनकर मैने अपने एक ब्राह्मण मित्र से कहा..क्या बाबा! यह क्या हो रहा है? (इधर पूर्वान्चल में ब्राह्मणों को बाबा कहने का चलन है।) मित्र नाराज हो कर बोले..जेतना धरइले हौउवन ओहमें केहू बाबा ना हौ, सब नकली बाबा हैं। 

★★★★★

आज की प्रस्तुति कैसी लगी?

आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहती है।

#श्वेता