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Monday, September 9, 2019

109..मैने पत्थरों में भी फूलों सी नज़ाकत देखी.....

स्नेहाभिवादन !
आज की सांध्य दैनिक प्रस्तुति में  सभी रचनाकारों और पाठकों का हार्दिक स्वागत !
'सांध्य दैनिक मुखरित मौन' की आज के चयनित सूत्रों की प्रस्तुति मेरी ओर से ….

मैंने पत्थर में भी फूलों सी नज़ाकत देखी
पिस के सीमेंट बने, ऐसी शराफ़त देखी

थी तेज हवा, उनका आँचल गिरा गई
इस शहर ने उस रोज क़यामत देखी

जीवन जितना सरल है उतना ही जटिल भी. जिसने यह राज समझ लिया वह सरलता और जटिलता दोनों से ऊपर उठ जाता है. जिस क्षण में जीवन जैसा मिलता है, उसे वह वैसा ही स्वीकार करता है. वन में जहरीले वृक्ष भी हैं और रसीले भी, गुलाब में कंटक भी हैं और फूल भी, यदि हम एक को स्वीकारते हैं और दूसरे को अस्वीकारते हैं तो मन सदा एक संघर्ष की स्थिति में ही बना रहता है.

गुलाब के फूल
 जब भी खिलेंगे 
 तो बहुत याद आओगे 
इतनी आसानी से
 मुझे न भूल पाओगे 
मैं कोई महक नहीं 
जो वायु के संग बह जाऊं

''मम्मी, पुण्य तो भूखे को रोटी खिलाने से मिलता हैं न? जिस तरह गैया को भूख लगती हैं ठीक उसी तरह सांड को भी तो भूख लगती होगी...फ़िर सिर्फ़ गैया को ही रोटी खिलाने से पुण्य क्यों मिलता हैं? सांड को रोटी खिलाने से पुण्य क्यों नहीं मिलता?

परिपक्व
हो चुके हैं हम
समझते हैं
समझ होनी
जरूरी है

आस पास
बहुत कुछ
होता है
बताना
किसलिये
जरूरी है

मदारी
ने ध्यान
भटकाया है

उसी
भारत
एक खोज
वाले के
भूत ने
प्रज्ञान को
लुढ़काया है

★★★★★

 शुभ संध्या
🙏
मीना भारद्वाज