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Wednesday, November 4, 2020

529 ...न कोई कारवाँ, न कोई निशां

ऐ चाँद
वह दाता !
जिससे हर सुहागन
कुछ साल उधार माँगती है
कि उसका सुहाग बना रहे .....
-सरस दरबारी
चलिए पिटारा खोलें...

आज एक रचना 
ब्लॉग मेरा चिन्तन से है
इस मंच मे प्रथम प्रवेश है
ब्लॉग लेखक है
श्री प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल जी
स्वागत है आपका

घंटों की आवाज से विष्णु जी विचलित हो उठे | 
लक्ष्मी जी ने परेशानी का
कारण जानना चाहा। भगवान ने कहा मुझे मेरा कोई 
भक्त बुला रहा है। मुझे अभी वहाँ जाना होगा |
हरी ने एक बालक का रूप धरा व वहाँ जा पहुँचे। वहाँ जा कर 
उसे अपना कन्धा दिया। जैसे ही भगवान का स्पर्श हुआ 
अर्थी एकदम हल्की हो गयी और महिला की मुक्ति हो गई |




व्रत से जुडे हर कथानक में एक बात प्रमुखता से 
सामने आती है कि स्त्री, पुरुष से ज्यादा धैर्यवान, 
सहिष्णु,  सक्षम, विपत्तियों का डट कर सामना 
करने वाली, अपने हक़ के लिए सर्वोच्च सत्ता से 
भी टकरा जाने वाली होती है


कुछ ही दूर पर अपनों का शिविर
जैसे मेरा ही इंतजार उनको था
नए नियमों का उल्लेख करते 
सैकड़ों  परिचित अपरिचित चेहरे 
सबके उठे हाथ और बंद मुट्ठी
कुछ ही क्षणों में कारवां बन गया


दुनिया की हकीकत 
रिश्तों की गठरी खुली
उघड़ी तुरपाई की मरम्मत हुई
जिन्दगी आहिस्ता आहिस्ता
कांटों में  खिलने लगी।।




मैं और तो कुछ नहीं जानती
पर इतना जानती हूँ
कि वक्त जो भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म ख़त्म होता है
तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है



निशा थी, गुम हर दिशा थी,
कहीं बादलों में, छुपी कहकशाँ थी,
न कोई कारवाँ, न कोई निशां,
कोई स्याह रातों से पूछे,
वो गुजरा था कैसे!
...
बस 
सादर